आखिर कैसे हुई थी rajasthani vastukala की शुरुआत। जहां राजपूतों को माना जाता है राजस्थानी वास्तुकला का वास्तुकार। जिनके द्वारा बनाए गए आज भी मौजूद है किले ओर महल।
1 rajasthani vastukala का संपूर्ण परिचय

यदि हम बात करे rajasthani vastukala के बारे में। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर राजस्थानी वास्तुकला का एक अभिन्न अंग है। तथा राजस्थान की प्रसिद्धि इसके जल संरचनाओं, हवेलियां, महलों, मंदिरों, किलो ओर भव्य ईमारतों से है। यदि में बात करूं। इस क्षेत्र की तो यहां हमें भौगोलिक प्रभाव ओर ऐतिहासिक सांस्कृतिक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।
कहा जाता है राजस्थानी वास्तुकला का विकसित होना। मूल रूप से राजपूत राजाओं, मुगलों, जैन धर्म अनुयायियों तथा ब्रिटिश काल के प्रभाव में संपन्न हुआ।
वही राजस्थान विभिन्न रंगों से निर्मित वाला। भारत देश का एक अनोखा रंगीन राज्य माना जाता है। वही rajasthani vastukala अपने आप में एक अलग पहचान रखती है। जहां पूरे देशभर में अपनी विशेष विशेषताओं के लिए जानी जाती है। जहां राजस्थान पूरे भारत देश में बेहतरीन ओर खूबसूरत पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाता है। जहां ऐतिहासिक ओर धार्मिक स्थल है। जो आए दिन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।
वहीं rajasthani vastukala में निम्नलिखित है। जिनमें अद्भुत दुर्ग, जटिल नक्काशीदार मंदिर ओर भव्य हवेलियां आदि शामिल हैं। जो राजपूतों द्वारा निर्मित वास्तुकार का एक उत्कृष्ठ उदाहरण है। जिनमें राजस्थान राज्य के कुछ प्रमुख उल्लेखनीय ओर सुंदर किले, महल एवं शुष्क अरावली पर्वतमाला रेगिस्तान राज्य की प्रसिद्ध विरासत के इतिहास के रूप में सभी प्रकार को चित्रित करते है।
2013 में राजस्थान के 6 दुर्गों को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में सूचीबद्ध किया गया था। जिनमें रणथंभौर का किला, गागरोन का किला, चित्तौड़गढ़ का किला, आमेर का किला, कुंभलगढ़ का किला ओर जैसलमेर का किला आदि शामिल है।
महाराणा कुम्भा को rajasthani vastukala का प्रमुख जनक माना जाता है। जो कला एवं स्थापत्य के संरक्षक थे। जिन्होंने अपने शासनकाल में लगभग 32 किलो का निर्माण करवाया था। जिनमें कुंभलगढ़ का किला जैसे भव्य किले आदि शामिल है।
2 राजस्थानी वास्तुकला की शुरुआती प्रक्रिया

राजस्थानी वास्तुकला का विकसित होना कई कारकों पर निर्भर करता है। जिनमें प्रमुख सामाजिक, भौगोलिक ओर भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन सांस्कृतिक को दर्शाता है। राजस्थान का इतिहास अनेकों मार्गों से प्रभावित हुआ है। जिनमें व्यापार, युद्धों ओर विभिन्न राजवंश आदि शामिल है।
जिनके द्वारा इसकी वास्तुकला को एक अद्वितीय ओर विविधतापूर्ण बनाया था। राजस्थानी वास्तुकला को मूल रूप से महलों, हवेलियों, मंदिरों ओर किलो की संरचनाओं में देखा जा सकता है।
हालांकि rajasthani vastukala का इतिहास। हमे प्राचीन काल से जुड़ा हुआ देखने को मिलेगा। जिसका विकसित होना निम्नलिखित चरणों में देखा जा सकता है..
1 प्रारंभिक काल ( 6वीं · 10वीं शताब्दी )
इस कालखंड के अंतर्गत राजस्थान क्षेत्र में गुर्जर·प्रतिहार वंश का प्रभाव माना जाता है। जहां मंदिरों के निर्माण कार्यों में नागर शैली का उत्कृष्ठ प्रभाव देखा गया था। जिसमें विकसित रूप से हुई संरचनाएं अलंकरण कला ओर शिखरयुक्त संरचनाओं को माना जाता है। जिनके प्रमुख उदाहरण किराडू के मंदिर ओर ओसियां का मंदिर है।
2 मध्यकाल ( 10वीं · 15वीं शताब्दी )

कहा जाता है इस कालखंड के अंतर्गत। राजपूत राजाओं का प्रभुत्व स्थापित हुआ था। जिसके चलते किले ओर दुर्गों के निर्माण कार्यों में वृद्धि हुई। वही इस संरचनाओं की सुरक्षा को बढ़ावा दिया गया। दूसरी तरफ वास्तुशिल्प के अंतर्गत बुर्ज (मीनार), खाई (खंदक), गुप्त मार्गों ओर विशाल दीवारों का समावेश किया गया था। इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं। कुंभलगढ़ किला (राजसमंद) ओर मेहरानगढ़ किला (जोधपुर) है। जो rajasthani vastukala के नमूने है।
3 मुगलकालीन प्रभाव ( 15वीं · 18वीं शताब्दी )
इस कालखंड में मुगल ओर राजपूत वास्तुकला का समन्वय देखा गया था। इस शैली के अंतर्गत हमे उद्यान, फव्वारे, संगमरमर ओर भव्य महलों का समावेश देखने को मिलता है। जिनके कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित है। सिटी पैलेस (उदयपुर) ओर आमेर महल (जयपुर) आदि शामिल है।
4 आधुनिक काल ( 18वीं शताब्दी के बाद )
इस कालखंड के अंतर्गत राजस्थान के व्यापारी वर्ग ( मारवाड़ी समाज ) के द्वारा हवेलियों का निर्माण करवाया गया था। इन हवेलियों के अंतर्गत हमे झरोखें (जालियां), भित्तिचित्र (फ्रेस्को पेंटिंग), रंगीन कांच ओर बारीक नक्काशी का अद्भुत इस्तेमाल किया। हमे देखने को मिला जाएगा। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं। जिनमें नाथमल की हवेली (जैसलमेर) ओर पटवों की हवेली (जैसलमेर) आदि शामिल हैं। जो rajasthani vastukala के अद्भुत नमूने हैं।
3 ऐतिहासिक किलों में राजस्थानी वास्तुकला का संगम

यदि भारतीय किलो में rajasthani vastukala को देखा जाए। तो इसके अंतर्गत हमें निम्नलिखित चीजें देखने को मिलेगी। जो मूल रूप से राजस्थानी वास्तुकला को दर्शाएगी।
हालांकि rajasthani vastukala मुख्य रूप से राजपूत शासकों द्वारा निर्मित होती है। जहां किलो की दीवारें विशाल, मजबूत ओर मोटे पत्थरों से बनी हुई देखने को मिलेगी। जहां अनेकों विशाल गुप्त सुरंगे भी शामिल होगी। जिनके बाहरी भाग में चौड़ी खाईयां मौजूद होगी। जहां किले का निर्माण कार्य किले की सुरक्षा को मध्य नजर रखते हुए बनाया जाता था।
वही किले के प्रवेश द्वार विशाल रूप में बनाए जाते थे। जिन्हें राजस्थानी भाषा में “पोल” कहा जाता है। मुख्य प्रवेश द्वार पर नुकीले कीलें लगाए जाते। ताकि कोई भी बाहरी आक्रमणकारी ( हाथी, घोड़े ओर ऊंटों द्वारा ) दरवाजों को तोड़ने में नाकामयाब रहे। वही किलों की दीवारों पर बड़े बड़े बुर्ज बनाए जाते थे। जहां से सैनिकों द्वारा किले की सुरक्षा की जाती थी। जो rajasthani vastukala के अद्भुत पहलू है।
वही राजस्थान की शुष्क जलवायु को मध्य नजर रखते हुए। किलो के अंदर कुंड, बावड़ियां ओर जलाशयों का निर्माण करवाया गया था। किलो के अंदर जनानखाना (रानियों का क्षेत्र), सभा मंडप (दरबार हॉल) ओर राजाओं के महलों का निर्माण करवाया गया था। इसके अलावा किलों में मंदिरों का निर्माण भी करवाया जाता। ताकि शासकों की मंदिरों के प्रति धार्मिक आस्था बनी रहे।
वही यहां नीचे विभिन्न किलों के अलग अलग प्रकारों को चिन्हित किया गया है। जिनमें कुछ निम्नलिखित है…
ओडुक दुर्ग ( जल दुर्ग ): ओडुक दुर्ग जिसे जल दुर्ग भी कहा जाता है। यह दुर्ग मुख्यतः पानी या जल के बीच में बने होते है। इन दुर्गों में चारों तरफ पानी होने के कारण। इन्हें प्राकृतिक सुरक्षा मिल जाती है।
उदाहरण के लिए चित्तौड़गढ़ दुर्ग में रानी पद्मिनी का महल है। जो तालाब के बीचों बीच बना हुआ है। तथा यह rajasthani vastukala का अद्भुत नमूना है।
गिरी दुर्ग ( पहाड़ी दुर्ग ): गिरी दुर्ग जिसे पहाड़ी दुर्ग के नाम से भी जाना जाता है। यह ऊंचे पहाड़ियों पर बने होते है। जिससे शत्रुओं द्वारा आक्रमण कर पाना मुश्किल होता है। जो इसकी सुरक्षा को दर्शाता है। तथा इनमें प्राकृतिक बाधाओं के कारण। रक्षा मजबूत होती है।
जिससे किसी भी आक्रमणकारियों पर उबलता हुआ गर्म तेल डालकर। उन्हें मारकर खत्म किया जा सकता है। गिरी दुर्ग ( पहाड़ी दुर्ग ) के कुछ उदाहरण निम्नलिखित है। जिनमें कुंभलगढ़ दुर्ग, रणथंभौर दुर्ग आदि शामिल है। वही राजस्थान राज्य में सबसे अधिक गिरी दुर्ग ( पहाड़ी दुर्ग ) की संख्या अधिक है।

धान्वन दुर्ग ( धन्वन दुर्ग, रेगिस्तानी दुर्ग ): धान्वन दुर्ग जिसे रेगिस्तानी दुर्ग भी कहा जाता है। यह मुख्यतः रेगिस्तान के बीच बने होते है। जो पूरी तरह रेत के टीलों से घिरे होते है। जहां सीमित जल श्रोत ओर कठिन मार्ग इसे सुरक्षित बनाते है। उदाहरण के लिए जैसलमेर दुर्ग को देखा जा सकता है। जो rajasthani vastukala का अद्भुत नमूना है।
वन दुर्ग ( जंगल किला ): वन दुर्ग जिन्हें जंगल दुर्ग में कहा जाता है। इस श्रेणियों में आने वाले दुर्ग वन या जंगलों में बने होते है। इन किलो का निर्माण प्राकृतिक रूप से छिपने ओर बचाव के लिए किया जाता है। उदाहरण के रूप में सिवाना दुर्ग को देखा जाता सकता है। जो पूरी तरह से जंगल के बीच स्थित है।
एरण दुर्ग ( कठिन भू भाग वाला दुर्ग ): एरण दुर्ग जिसे कठिन भू भाग वाला दुर्ग भी कहा जाता है। यह दुर्ग मुख्य रूप से दुर्गम क्षेत्र, गहरी खाई, चट्टानों ओर ऊंचाई पर बने होते है। जिससे इनकी मजबूत रक्षा प्रणाली ओर कठिन पहुंच की वजह से सुरक्षित रहता है। तथा उदाहरण के रूप में चित्तौड़गढ़ का किला एवं जालौर का किला आदि शामिल है। जो rajasthani vastukala का उत्कृष्ठ उदाहरण है।
पारीक दुर्ग ( खाई से घिरा हुआ दुर्ग ): पारीक दुर्ग से खाई से घिरा हुआ दुर्ग भी कहा जाता हैं। इन दुर्गों के चारों तरफ गहरी खाई होती है। जो इसकी सुरक्षा को दर्शाता है। तथा जल से भरी खाई आक्रमणकारियों को रोकने में सहायक होती है। वही उदाहरण के लिए भरतपुर का किला, बीकानेर के किले को देखा जा सकता है।
सेना दुर्ग ( सैन्य किला ): सेना दुर्ग जिसे सैन्य किला भी कहा जाता हैं। यह विशेष रूप से सैनिकों के लिए बने होते है। जहां सैनिकों के लिए युद्ध की योजना ओर रणनीति बनाई जा सकती हो। जहां रक्षा ओर युद्ध संचालन का केंद्र होता है। वही इसके उदाहरण के रूप में अजमेर का मैगजीन किले को देखा जा सकता है। जो rajasthani vastukala को दर्शाता है।
सहाय दुर्ग: सहाय दुर्ग उन्हें कहा जाता है। जहां बहादुर योद्धा सौहार्दपूर्ण समुदाय निवास करते थे। तथा यह सामाजिक ओर सामरिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित होते थे।
4 ऐतिहासिक मंदिरों में राजस्थानी वास्तुकला का निचोड़

नागर शैली: नागर शैली वह शैली है। जो मंदिरों की आधार से शिखर तक चुंबकीयकोणीय में निर्मित होती है। जहां इसमें समतल छत से ऊपर उठे शिखर तक की प्रधानता होती है। नागर शैली को आर्य शैली भी कहा जाता है। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित है।
जिनमे दिलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू), रणकपुर जैन मंदिर (पाली), ओसियां मंदिर (जोधपुर), ब्रह्मा मंदिर (पुष्कर, अजमेर), सोमेश्वर मंदिर (आबू रोड), परशुराम महादेव मंदिर (राजसमंद), अंबिका माता मंदिर (झालावाड़), सास-बहू का मंदिर (नागदा, उदयपुर), कैलाशपुरी का एकलिंगजी मंदिर (उदयपुर), वराह मंदिर (पुष्कर, अजमेर) आदि शामिल है। जो rajasthani vastukala के अंतर्गत नागर शैली निर्मित है।
द्रविड़ शैली: द्रविड़ शैली वह शैली होती है। जिसकी दिखावटी पिरामिडनुमा बहुमंजिला इमारत होती है। उदाहरण के रूप में पुष्कर के रंगनाथ का मंदिर ओर। चूरू में स्थित बालाजी मंदिर को देखा जा सकता हैं। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित है।
जिनमें महावीर जी मंदिर (करौली), राजा रणछोड़ मंदिर (आबू रोड), मीनाक्षी मंदिर (अलवर), रामेश्वरम महादेव मंदिर (कोटा), नावलक्खा मंदिर (दूधू, जयपुर), उमा महेश्वर मंदिर (राजसमंद), शिव मंदिर (दूधू, जयपुर), हनुमानजी का मंदिर (जयपुर), बालाजी धाम (चित्तौड़गढ़), संकट मोचन हनुमान मंदिर (जोधपुर) आदि शामिल है। जो मुख्य रूप से rajasthani vastukala के अंतर्गत द्रविड़ शैली में निर्मित हैं।

बेसर शैली: बेसर शैली वह शैली होती है। जिनमें हमे नागर वह द्रविड़ शैली का मिला जुला रूप। हमे देखने को मिलता है। तथा इस शैली को चालुक्य शैली भी कहा जाता हैं। इनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित है।
जिनमें ककेय मंदिर (बागलकोट, कर्नाटक), दुर्गा मंदिर (ऐहोल, कर्नाटक), लाड खान मंदिर (ऐहोल, कर्नाटक), पापनाथ मंदिर (पट्टदकल, कर्नाटक), विरुपाक्ष मंदिर (पट्टदकल, कर्नाटक), जैन नारायण मंदिर (पट्टदकल, कर्नाटक), मल्लिकार्जुन मंदिर (पट्टदकल, कर्नाटक), भूतनाथ मंदिर (बादामी, कर्नाटक), संगमेश्वर मंदिर (कुडल संगम, कर्नाटक), गालगनाथ मंदिर (पत्तदकल, कर्नाटक) आदि शामिल है। जो rajasthani vastukala के अंतर्गत बेसर शैली में निर्मित हैं।
पंचायतन शैली: पंचायतन शैली वह शैली होती है। जिसमें 1 मुख्य अंदर वह 4 छोटे छोटे मंदिर भी शामिल होते है। इनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं।
जिनमें कंदरिया महादेव मंदिर (खजुराहो, मध्य प्रदेश), विष्णु मंदिर (देवगढ़, उत्तर प्रदेश), लक्ष्मण मंदिर (खजुराहो, मध्य प्रदेश), कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा, महाराष्ट्र), विट्ठल मंदिर (हम्पी, कर्नाटक), जगदंबी मंदिर (खजुराहो, मध्य प्रदेश), सूर्य मंदिर (मोढेरा, गुजरात), ब्राह्मणी मंदिर (ओसियां, राजस्थान), गोविंद देव जी मंदिर (वृंदावन, उत्तर प्रदेश), मार्तंड सूर्य मंदिर (अनंतनाग, जम्मू-कश्मीर) आदि शामिल हैं। जो rajasthani vastukala के अंतर्गत पंचायतन शैली में निर्मित है।
एकायतन शैली: एकायतन वह शैली होती है। इसमें एक ही देव मंदिर की प्रधानता होती है। मतलब एक मंदिर में एक ही देव की प्रधानता की उपलब्धि। उनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित है।
जिनमें दशावतार मंदिर (देवगढ़, उत्तर प्रदेश), लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर, छत्तीसगढ़), ओसियां का महावीर मंदिर (राजस्थान), गुप्तेश्वर महादेव मंदिर (भोपाल, मध्य प्रदेश), लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर, ओडिशा), राजीवलोचन मंदिर (राजिम, छत्तीसगढ़), मुकुटेश्वर मंदिर (भोपाल, मध्य प्रदेश), कपालेश्वर मंदिर (चेन्नई, तमिलनाडु), नरसिंह मंदिर (माहेश्वर, मध्य प्रदेश), चामुंडा देवी मंदिर (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश) आदि शामिल है। जो rajasthani vastukala के उत्कृष्ठ उदाहरण है।
5 महत्वपूर्ण इमारतों में राजस्थान की वास्तुकला
राजस्थानी वास्तुकला महत्वपूर्ण इमारतों में। अपनी भव्यता, विशिष्ट निर्माण शैली पर सांस्कृतिक महत्व के लिए जानी जाती हैं। राजस्थान वास्तुकला शिल्पकला, सौंदर्य ओर भवनों में सुरक्षा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

महल: rajasthani vastukala से निर्मित महलों में। हमें छतरियां, झरोखें ओर बालकनीयों के सुंदर संयोजन देखने को मिलता है। जिनमें रंगीन कांच आईना कार्य ओर भित्ति चित्रों का प्रयोग किया जाता हैं। वही आंतरिक भागों में भव्य सभागार, दीर्घाएं एवं शयनकक्ष देखने को मिलते है।
हवेलियां: rajasthani vastukala से निर्मित हवेलियां। मुख्यतः व्यापारियों तथा अमीर वर्ग के लोगों के लिए प्रसिद्ध है। जिनकी दीवारों पर उत्कृष्ठ भित्ती चित्र ओर जालीदार खिड़कियां बनी होती है। जिनमें झरोखा शैली का अद्भुत उपयोग किया जाता है।
बावड़ियां: rajasthani vastukala से निर्मित बावड़ियां। जिनके अंतर्गत जल संरक्षण के लिए सीढ़ीनुमा संरचनाएं होती है। जिनके कुछ उदाहरण निम्नलिखित है। चांद बावड़ी ( आभानेरी ), पन्ना मीना कुंड आदि।
छतरियां: राजस्थानी वास्तुकला से निर्मित छतरियां। जो शाही परिवारों की स्मृति में निर्मित स्मारक है। जिनमें गुंबदनुमा संरचना के साथ सुंदर नक्काशी देखी जा सकती हैं।
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