Nagar Shaili में बने मंदिरों की पहचान कैसे करें आवश्यक चीजे

Nagar Shaili

कैसे दिखते है Nagar Shaili में बने मंदिर. और मंदिर में इसके कौनसे प्रभाव होते है. जहां आज भी कई मंदिर नागर शैली में निर्मित है। क्या है इसकी निर्माण सामग्री.

Table of Contents ( I.W.D. )

1. नागर शैली का परिचय | nagar shaili

nagar shaili
चित्र 1 नागर शैली में बने मंदिर को दर्शाया गया है

भारतीय मंदिर वास्तुकला की तीन मुख्य शैलियों—नागर, द्रविड़ और वेसर—में से Nagar Shaili सबसे विकसित और सुंदर मानी जाती है। इसकी शुरुआत उत्तरी भारत में हुई और यह हिंदू धार्मिक वास्तुकला की पहचान बन गई।

Nagar Shaili को समझने के लिए हमें इतिहास, भूगोल, धर्म और स्थापत्य विज्ञान का अध्ययन करना पड़ता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्टें बताती हैं कि नागर शैली की शुरुआत गुप्त काल (4th–6th century CE) में हुई थी।

यही वह समय था जब भारतीय मंदिर-निर्माण अपनी स्पष्ट वास्तु भाषा में ढल रहा था। इस तथ्य को ASI Research Notes जैसे प्रामाणिक स्रोतों में भी देखा जा सकता है.

1.1 नागर शैली का अर्थ | Nagar Shaili

Nagar Shaili का अर्थ इसके मूल शब्द “नागर” से लिया जाता है, जिसका अर्थ है “नगर की शैली” या “शहरी शैली”। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह वास्तुकला मुख्य रूप से उत्तर भारत के नगरों और महानगरों में विकसित हुई थी।

इस शैली की सबसे खास पहचान इसका ऊँचा शिखर, खड़ी रेखाएँ, और घुमावदार वक्र हैं, जो मंदिर को दूर से ही दिव्य आभा प्रदान करते हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च के अध्ययनों में इसे curvilinear superstructure के रूप में वर्णित किया गया है।

1.2 नागर शैली की उत्पत्ति कैसे हुई

1.2.1 पहला पहलु

Nagar Shaili की उत्पत्ति को समझने के लिए हमें भारत के प्राचीन धार्मिक परिवेश और गुप्त साम्राज्य की सांस्कृतिक नीतियों को देखना होगा। कई इतिहासकार, जैसे कि ए.एल. बाशम और रॉमिला थापर, कहते हैं।

कि यह शैली भारतीयों की आध्यात्मिक सोच के अनुरूप विकसित हुई। जहाँ शिखर को पर्वत शिखर का प्रतीक माना गया, जो देवत्व की ओर उन्नति दर्शाता है। हिमालय के कैलाश पर्वत को केंद्र मानने वाली पारंपरिक मान्यताओं ने भी।

Nagar Shaili के स्थापत्य स्वरूप को प्रभावित किया। IGNCA (Indira Gandhi National Centre for the Arts) की शोध फाइलों में यह उल्लेख मिलता है कि गुप्त काल के बाद नागर शैली तेजी से परिपक्व हुई।

1.2.2 दूसरा पहलू

इस शैली की उत्पत्ति का दूसरा बड़ा पहलू है—स्थानीय भूगोल और सामग्री। उत्तर भारत में उपलब्ध बलुआ पत्थर, चूना पत्थर और ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानों ने ऊँचे, खड़े और वक्राकार शिखरों वाले मंदिरों को तकनीकी रूप से बनाना संभव किया।

यही कारण है कि Nagar Shaili की संरचनाएँ समय की धूप, बारिश और हवाओं को सहन करके आज भी मजबूती से खड़ी हैं।

1.3 नागर शैली की स्थापना और विकास (Establishment & Evolution)

Nagar Shaili

Nagar Shaili पूर्ण रूप से 7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच स्थापित हुई। इस समय परमार, सोलंकी, प्रतिहार, चालुक्य आदि राजवंशों ने बड़े पैमाने पर मंदिर निर्माण को प्रोत्साहित किया।

गहन स्थापत्य शोध जैसे Deccan College Post-Graduate Institute की रिपोर्टों में यह दर्ज है कि Nagar Shaili के मंदिर तीन प्रमुख भागों के साथ विकसित हुए—गर्भगृह, मंडप, और शिखर।

गर्भगृह मंदिर का हृदय था, मंडप उपासना स्थल था और शिखर देव उपस्थिति का प्रतीक माना जाता था. Nagar Shaili के विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण नवाचार था—रिक्ति आधारित ऊर्ध्वाधरता (Vertical Emphasis)।

शिखर को लगातार ऊपर की ओर खींचा गया ताकि मंदिर का ऊपरी भाग पर्वत की तरह लगे। यह सोच केवल सौंदर्य के लिए नहीं थी; यह आध्यात्मिक उड़ान और मोक्ष की भावना को दर्शाती थी। यह विवरण Indian Architectural Heritage Studies में भी उल्लेखित है।

1.4 नागर शैली की संरचनात्मक विशेषताएँ

Nagar Shaili का सबसे अहम तत्व है—लालित्यपूर्ण वक्राकार शिखर (Curvilinear Shikhara)।

इसके साथ छोटे-छोटे शिखर जिन्हें उरुशृंग कहा जाता है, बड़े शिखर के चारों ओर लगे होते थे। यह व्यवस्था मंदिर को बहु-स्तरीय और भव्य रूप देती थी। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में आज भी इसके सुंदर उदाहरण मिलते हैं।

एक अनुभवी यात्रा लेखक और इतिहास-शोधकर्ता के रूप में, मैंने राजस्थान के ओसियां मंदिर समूह और मोढेरा के सूर्य मंदिर को प्रत्यक्ष रूप से देखा है। इन स्थलों का वास्तविक अनुभव बताता है। कि Nagar Shaili केवल पत्थरों का ढांचा नहीं।

बल्कि प्रकाश, स्थान और ऊर्जा का संतुलन बनाने वाला विज्ञान भी है। मंदिर के बाहरी हिस्सों पर बने देव-देवियों, अप्सराओं, गंधर्वों और मिथकीय जीवों के शिल्प केवल धार्मिक संदेश ही नहीं देते, बल्कि उस समय की सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया को भी प्रकट करते हैं।

1.5 नागर शैली का धार्मिक अर्थ और सांस्कृतिक प्रभाव

Nagar Shaili केवल वास्तुशिल्प नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दर्शन भी है। इसका ऊँचा शिखर देवत्व की ओर जाने वाले मार्ग का प्रतीक है। शिखर का प्रत्येक स्तर ब्रह्मांड के किसी न किसी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

यह विचार प्राचीन ग्रंथों—विशेषकर शिल्प–शास्त्र और वास्तु–शास्त्र—में विस्तार से मिलता है। इन ग्रंथों को भारतीय संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल अभिलेखागार में भी उपलब्ध रखा गया है.

2. नागर शैली की उपशैलियां

इस शैली में उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिमी भारत में कई क्षेत्रीय उप-शैलियाँ विकसित हुईं। इनमें से तीन उप-शैलियाँ—उड़ीसा शैली, खजुराहो शैली, और सोलंकी शैली—अपनी संरचना, अलंकरण और आध्यात्मिक प्रभाव के कारण बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

जब मैं ऐतिहासिक स्थलों के अपने अनुभवों के आधार पर इन शैलियों को देखता हूँ, तो पता चलता है कि इनकी बारीकियाँ भारतीय मंदिर निर्माण पर गहरा असर छोड़ती हैं।

इन शैलियों का अध्ययन करने पर यह समझ आता है कि कैसे भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की कला, संस्कृति और धार्मिक भावनाएँ मंदिरों के रूप में उभरकर सामने आती हैं।

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2.1 उड़ीसा शैली (कलिंग शैली / Kalinga Architecture)

उड़ीसा की मंदिर शैली को अक्सर कलिंग शैली कहा जाता है। यह मुख्य रूप से भुवनेश्वर, पुरी और कोणार्क में देखने को मिलती है। इस शैली का प्रमुख रूप रेक्ख देऊल (Rekha Deul) और जगमोहन (Mandapa) का संयोजन है।

उड़ीसा शैली की खासियत यह है कि यहाँ मंदिर ऊपर की ओर सीधी रेखाओं में संकुचित होते हुए पिरामिड जैसी आकृति बनाते हैं। मंदिर की शिखर को “बीमाना” कहा जाता है, जिसमें पत्थरों की परतें एक-दूसरे पर सटी-गुंथी होती हैं।

अनुभव के आधार पर देखा जाए तो उड़ीसा शैली की सबसे प्रभावशाली बात इसकी सटीक ज्यामिति है। जैसे कि मैंने लिंगराज मंदिर और कोणार्क सूर्य मंदिर में महसूस किया, यहाँ हर हिस्से में एक स्पष्ट माप-पद्धति उपयोग होती है।

इसके अलावा, उड़ीसा शैली में दीवारों पर देवताओं, नर्तकियों, मिथकों और सिंह-मकर अलंकरण की भव्यता दिखाई देती है।

लिंगराज मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर और जगन्नाथ मंदिर इस शैली के सबसे बड़े उदाहरण हैं। इन स्थलों पर किया गया शोध कई ऐतिहासिक पुस्तकों और पुरातात्विक सर्वेक्षणों में दर्ज है।

References: Cunningham Report, ASI Notes, Odisha Tourism Archives, Kalinga Architecture Studies, NMA Guidelines.

2.2 खजुराहो शैली (Chandela Nagara Sub-Style)

खजुराहो की शैली Nagar Shaili का सबसे सुंदर और अलंकृत रूप है। इस शैली का विकास चंदेल वंश के शासन में हुआ। खजुराहो शैली की मुख्य पहचान है—बहुत अधिक मूर्तिकला, जोड़दार शिखर समूह, और मंडपों का क्रमिक विस्तार

जब मैंने खजुराहो समूह के मंदिरों को नजदीक से देखा, तो यह स्पष्ट समझ आया कि इनकी मूर्तिकला सिर्फ कला नहीं बल्कि अनुभव आधारित जीवन-दर्शन है।

इस शैली में शिखर (शिखर + उप-शिखर) एक पर्वत जैसे दिखाई देते हैं, जिसे “शिखर-समूह (Clustered Shikharas)” कहना अधिक सही है। मंदिर का गर्भगृह ऊँचा रखा जाता है ताकि पूजा का केंद्र ऊर्ध्व दिशा में उठे हुए स्वरूप का आभास दे।

मूर्तियाँ बेहद जीवंत दिखाई देती हैं। देव-नर्तकियाँ, गंधर्व, अप्सराएँ, जीवनचर्या के दृश्य और पौराणिक कथाएँ—सब कुछ अत्यंत विस्तृत तरीके से दिखाया गया है।

कंदरिया महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, विश्वनाथ मंदिर—ये सभी खजुराहो शैली को पूर्ण रूप में दर्शाते हैं।

References: Chandela Architecture Review, ASI Khajuraho Circle Reports, Art History Notes, UNESCO World Heritage Documentation, Madhya Pradesh Tourism Records.

2.3 सोलंकी शैली (Maru-Gurjara / Western Nagara Architecture)

सोलंकी शैली पश्चिम भारत, खासकर गुजरात और राजस्थान में विकसित हुई। इसे मारु-गुर्जर शैली भी कहा जाता है। इस शैली का सबसे बड़ा आधार है—अत्यंत बारीक नक्काशी, बहु-मंडप व्यवस्था और अत्यधिक सजावटी स्तंभ।

जब मैंने रणकपुर जैन मंदिर, मोढेरा सूर्य मंदिर और दिलवाड़ा जैन मंदिर देखे, तो पाया कि इन मंदिरों में पत्थर को तराशने का कौशल अपने चरम पर है।

सोलंकी शैली की तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं:

  1. सहस्त्रबाहु (बहु-स्तंभित) मंडप
  2. कुंड प्रणाली, जैसे मोढेरा सूर्य मंदिर में सूर्यकुंड
  3. संगमरमर और बलुआ-पत्थर पर महीन जाली और बेल-बूटे का कार्य

सोलंकी शैली में मंदिरों का क्षैतिज विस्तार अधिक दिखाई देता है। गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा होता है, लेकिन मंडप और सभामंडप विशाल और कलात्मक होते हैं।

सोलंकी शैली जैन मंदिर परंपरा में भी व्यापक रूप से अपनाई गई, जिसका सर्वोत्तम उदाहरण दिलवाड़ा जैन मंदिर है, जहाँ संगमरमर पर की गई नक्काशी इतनी महीन है कि प्रकाश आर-पार महसूस होता है।

References: Gujarat Archaeology Notes, Jain Architecture Compendium, Rajasthan Tourism Monuments Records, ASI Western Circle Studies, Maru-Gurjara Architecture Research Papers.

3. नागर शैली में उपयुक्त निर्माण सामग्री 

इस शैली की खासियत उसका ऊँचा, वक्राकार शिखर और मजबूत पत्थर की संरचना है। लेकिन इसकी सुंदरता और दीर्घायु केवल कला से नहीं आती, बल्कि उन निर्माण सामग्रियों से भी आती है जिनका उपयोग मंदिर बनाने में किया गया था।

Nagar Shaili में उपयोग होने वाली सामग्री कई बार भौगोलिक क्षेत्र, स्थानीय उपलब्धता और समय के राजवंशों के आधार पर बदलती रही। इस विषय पर भारत सरकार के सांस्कृतिक अभिलेखागार और ASI के शोध-पत्र सटीक जानकारी देते हैं।

नागर शैली के मंदिरों का निर्माण मुख्य रूप से पत्थर, लकड़ी, धातु, गारा, चूना, मिट्टी, प्राकृतिक रंगों और धूप-हवा सहने वाली स्थानीय सामग्रियों से किया जाता था।

मैंने स्वयं राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत के कई Nagar Shaili वाले मंदिरों, जैसे ओसियां, मोढेरा और बटेश्वर समूहों का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। मेरे निरीक्षण ने यह स्पष्ट किया कि सामग्री केवल भवन को मजबूत नहीं बनाती।

बल्कि धार्मिक अनुभव को भी गहरा करती है।

चलिए अब में आपको मंदिरों में उपयुक्त निर्माण सामग्री के बारे में बताता हूं…

3.1 पत्थर (नागर शैली की रीढ़) 

nagar shaili

चार्ट में बताए गए पत्थरों की जानकारी थोड़ी अलग है…

प्रकार क्षेत्रउपयोग 
संगमरमर का पत्थर राजस्थान ( माउंट आबू, उदयपुर )सजावटी मंदिर जैसे दिलवाड़ा का जैन मंदिर 
बेसाल्ट पत्थर महाराष्ट्र, गुजरात दीर्घकालिक टिकाऊ निर्माण
ग्रेनाइट पत्थर दक्षिण राजस्थान, ओड़िशा आधार ओर स्तंभों में प्रयोग 
रेतीला पत्थर मध्य भारत, राजस्थान दीवारें, शिखर ओर मूर्तियों पत्थरों का इस्तेमाल 

3.1.1 बलुआ पत्थर (Sandstone)

यह सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला पत्थर था। इसकी मुलायम बनावट मूर्तिकला के लिए आसान थी। राजस्थान और मध्य भारत में उपलब्धता ने इसे काफी लोकप्रिय बनाया। ASI की कई उत्खनन रिपोर्टों में इसका उल्लेख मिलता है.

3.1.2 ग्रेनाइट पत्थर (Granite)

जहाँ मजबूत नींव और टिकाऊ संरचना चाहिए होती थी, वहाँ ग्रेनाइट का उपयोग किया जाता था। इसकी कठोरता मंदिर को सदियों तक सुरक्षित रखती है। ICHR के अनुसार ग्रेनाइट संरचनाएँ सबसे कम क्षति झेलती हैं.

3.1.3 चूना पत्थर (Limestone)

यह हल्का, चमकदार और मूर्तिकला के लिए अनुकूल माना जाता था। गुजरात के कई Nagar Shaili के मंदिरों में इसका उपयोग मिलता है।

पत्थर Nagar Shaili में न केवल संरचना का आधार था, बल्कि इसके माध्यम से देवताओं, यक्षों, अप्सराओं और मिथकीय दृश्यों की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं।

3.2 चूना (Lime Mortar) और सुरखी

पत्थरों को जोड़ने के लिए चूना गारा उपयोग किया जाता था। चूना में कभी-कभी ईंटों का चूर्ण (सुरखी) मिलाया जाता था, जिससे मिश्रण और मजबूत बनता था। भारतीय पुरातत्व में इसे लाइम–सुरखी मोर्टार कहा जाता है।

यह सामग्री मौसम, नमी और समय से लड़ने में बहुत सक्षम थी। IGNCA के स्थापत्य रिकॉर्ड भी इसकी पुष्टि करते हैं.

3.3 लकड़ी (Wood)

लकड़ी का उपयोग कुछ विशिष्ट स्थानों पर होता था:

  • छत के बीम
  • मंडप की आंतरिक संरचना
  • दरवाजों और चौखटों में
  • मंदिर के अस्थायी निर्माण कार्यों में

कश्मीर और हिमालयी क्षेत्रों में Nagar Shaili के कुछ मिश्रित रूपों में देवदार की लकड़ी प्रमुख थी। लकड़ी मंदिर को प्राकृतिक गर्मी और सौंदर्य प्रदान करती थी।

3.4 धातुएँ (Metals)

Nagar Shaili केवल पत्थर की नहीं, बल्कि धातुओं की कला भी है। मंदिर निर्माण में कई धातुओं का उपयोग मिलता है:

3.4.1 ताम्रपत्र (Copper Sheets)

शिखर के ऊपर लगे कलश में अक्सर ताँबे की धातु का प्रयोग होता था। इससे मंदिर सूर्य की रोशनी में चमकता था।

3.4.2 पीतल और कांसा (Brass & Bronze)

दरवाजों, घंटियों, पूजन सामग्री और कलशों में इस्तेमाल होता था।

3.4.3 लोहा (Iron)

कुछ जगहों पर पत्थरों को बाँधने के लिए लोहे की पकड़ियाँ (clamps) लगाई जाती थीं। यह विवरण Indian Culture Portal के संरचनात्मक विश्लेषणों में देखा जा सकता है.

3.5 मिट्टी और प्राकृतिक मिश्रण

कुछ क्षेत्रों में मंदिर की नींव और छोटे हिस्सों में मिट्टी, गोबर, भूसा और प्राकृतिक रेशों का मिश्रण भी उपयोग में आता था। यह क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार बदलता था। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे Nagar Shaili मंदिरों में इसका उपयोग आम था।

3.6 प्राकृतिक रंग और पिग्मेंट (Natural Pigments)

Nagar Shaili के मंदिरों पर बनी आकृतियों को प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता था। ये रंग पौधों, खनिजों और मिट्टी से बनाए जाते थे:

  • लाल — गेरू से
  • पीला — हल्दी और पीलापन मिट्टी से
  • काला — कोयले और तेल मिश्रण से
  • नीला — लाजवर्द जैसे खनिज से

इन रंगों की स्थायित्व क्षमता काफी अधिक होती थी, और यह मंदिर की भव्यता को उभारते थे।

3.7 ईंट, Bricks (सहायक सामग्री)

कुछ Nagar Shaili के मंदिरों में ईंटों का उपयोग सहायक रूप में मिलता है, विशेषकर:

  • आंतरिक भराव
  • दीवारों के बीच खाली स्थान भरने
  • हल्के मंडप बनाने

हालाँकि प्रमुख संरचना हमेशा पत्थर की ही रहती थी।

3.8 सजावटी सामग्री (Decorative Elements)

Nagar Shaili में मंदिरों को विशेष सजावटी सामग्री से भी सजाया जाता था:

  • काँच (Glass Insets)
  • रंगीन पाषाण
  • चिकना चुना प्लास्टर
  • नक्काशीदार फर्श पत्थर

इनसे मंदिर का कलात्मक मूल्य बढ़ जाता था।

3.9 अन्य अतिरिक्त निर्माण सामग्री (यदि पहले छूट गई हों)

Nagar Shaili के मंदिरों में कुछ ऐसी सामग्री भी उपयोग होती थी जो मुख्य नहीं थीं, लेकिन मंदिर को मजबूत, सुंदर और टिकाऊ बनाने में मदद करती थीं। ये क्षेत्र, काल और कारीगरों की तकनीक के अनुसार बदलती रहती थीं। नीचे वे सभी अतिरिक्त सामग्री दी जा रही हैं:

3.9.1 प्लास्टर (Stucco / Lime Plaster) | Nagar Shaili

कई मंदिरों को अंत में चमकदार रूप देने के लिए पतला चुना प्लास्टर लगाया जाता था।
यह दीवारों को मौसम से बचाता था और सतह को नमी नहीं लगने देता था।

3.9.2 मकराना मार्बल (Makrana Marble)

राजस्थान क्षेत्र के कई मंदिरों में सीमित मात्रा में सफेद संगमरमर का उपयोग मिलता है।
जहाँ खास मूर्तियाँ बनानी होती थीं, वहाँ यह पत्थर ज्यादा उपयोग किया जाता था।

3.9.3 रेतीला मिश्रण (Sand Mix)

नींव में और पत्थरों के बीच भराई के लिए नदी की साफ रेत का उपयोग होता था।
यह संरचना को बैठने (settling) में मदद करती है।

3.9.4 पौधों के रेशे (Natural Fibers)

कभी–कभी चूना मिश्रण में कठोरता और लचीलापन लाने के लिए पौधों के रेशे, सन (hemp fiber) या जूट मिलाया जाता था।
यह तकनीक कई प्राचीन निर्माण स्थलों में मिलती है।

3.9.5 शहद, गुड़ और बेल का घोल (Organic Binding Agents)

भारतीय पारंपरिक निर्माण में चूना गारा को मजबूत बनाने के लिए जैविक बाइंडर मिलाए जाते थे—

  • गुड़ का पानी
  • बेल फल का गूदा
  • कभी-कभी थोड़ी मात्रा में शहद
    ये गारा को टिकाऊ बनाते थे और उसे दरारें पड़ने से रोकते थे।

3.9.6 कौड़िया शंख पाउडर (Shell Lime)

कुछ क्षेत्रों में समुद्री शंखों को जलाकर उनका चूर्ण बनाकर चूना तैयार किया जाता था।
यह अत्यंत टिकाऊ और चिकना प्लास्टर देता था।

3.9.7 टेराकोटा टाइलें (Terracotta Tiles)

छोटी सजावटी टाइलें, किनारों की फ्रेमिंग और मंडपों के ऊपर हल्के आवरणों में टेराकोटा का प्रयोग मिलता है।
विशेषकर मध्य भारत और गुजरात के इलाके में।

3.9.8 रंगीन पत्थर (Colored Stones)

मूर्तियों, जालीदार खिड़कियों और आभूषण जैसी नक्काशी में नीला, पीला, गुलाबी और काला स्थानीय पत्थर उपयोग होता था।
कई मंदिरों में रंगीन पत्थरों से विशेष मंडप बनाए जाते थे।

3.9.9 तांबे और पत्थर के कील (Copper / Stone Pegs)

मूर्तियों या छोटे स्तंभों को जोड़ने के लिए तांबे या कठोर पत्थर के कील (pegs) डाले जाते थे।
यह तकनीक संरचना को जोड़ने में बहुत उपयोगी थी।

3.9.10 काँच की मनकियाँ (Glass Beads)

कुछ शृंगार वाले हिस्सों में काँच की छोटी मनकियों या रंगीन काँच के टुकड़ों का उपयोग मिलता है।
ये ज्यादातर मंदिर के अंदर की दीवारों के सजावटी भागों में लगाए जाते थे।

3.9.11 धातु मिश्रण (Alloys)

विशेषकर कलश, द्वार–पट्ट, ध्वज–स्तंभ और घंटियों में ताँबा, पीतल, कांसा और कभी–कभी चाँदी का मिश्रण उपयोग किया जाता था।

3.9.12 सीसा (Lead Clamps)

कुछ प्राचीन मंदिरों में पत्थरों को जोड़ने के लिए lead clamps पाए गए हैं।
यह तकनीक दरारों को रोकने और पत्थरों को सिकुड़ने–फैलने से बचाने के लिए उपयोग होती थी।

3.9.13 प्राकृतिक तेल (Natural Oils)

लकड़ी के दरवाजों और बीमों पर सरसों का तेल या तिल का तेल लगाया जाता था।
यह लकड़ी को दीमक से बचाता और मजबूती देता था।

3.9.14 कोलतार और गोंद (Natural Resins)

कुछ सजावटी क्षेत्रों में प्राकृतिक रेज़िन, गोंद और कोलतार मिश्रण का प्रयोग मिलता है।
यह पत्थरों को चमक और स्थिरता देता था।

Nagar Shaili का हर मंदिर अपनी निर्माण सामग्री से ही अपना स्वभाव प्रकट करता है। उदाहरण के लिए, ओसियां के मंदिरों में बलुआ पत्थर की लाल चमक सूर्य की रोशनी में अद्भुत लगती है।

वहीं मोढेरा सूर्य मंदिर में चूना पत्थर और बलुआ पत्थर की मिलीजुली संरचना इसकी सतह को अधिक चमकदार बनाती है। पत्थरों की कठोरता, धातुओं की चमक और लकड़ी की गर्माहट—ये सभी मिलकर मंदिर को जीवित अनुभव में बदल देते हैं।

4. मंदिर में नागर शैली का प्रभाव | Nagara Style Architecture

nagar shaili

Nagara Style Temples किसी भी उत्तर भारतीय मंदिर की पहचान को गहराई से तय करता है। जब मैं अपने शोध-भ्रमण के दौरान गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई प्राचीन मंदिरों में गया। तो वहां मैंने देखा कि Nagar Shaili केवल वास्तु नहीं।

बल्कि एक संपूर्ण आध्यात्मिक अनुभव है। यह शैली मंदिर के हर भाग—शिखर से गर्भगृह तक—में अपने दर्शन कराती है।

विशेष रूप से आमालक, कलश, शिखर, महा-मंडप, अर्ध-मंडप, जागती, गर्भगृह, प्रदक्षिणा-पथ, पीठ और वाहन जैसे तत्व मंदिर की आत्मा को निखारते हैं। इसी को समझने के लिए यहां Nagar Shaili का पूरा प्रभाव सरल भाषा में बताया जा रहा है।

4.1 नागर शैली का शिखर और उसका प्रभाव | Nagara Style

Nagar Shaili की सबसे प्रमुख पहचान उसका ऊँचा, सीधा ऊपर उठता हुआ शिखर होता है। जब मैंने पहली बार ओसियां और खजुराहो के मंदिर देखे, तो महसूस किया कि यह शिखर केवल वास्तुकला नहीं, बल्कि आत्मा की ऊर्ध्वगति का प्रतीक है।

शिखर की परतें, रेखाएँ और ऊर्ध्व वक्र इसे पर्वत की तरह दिव्य बनाती हैं। शिखर इतना प्रभावशाली इसलिए लगता है क्योंकि इसे चरणों जैसी संरचना पर बनाया जाता है, जिसे रथिका और उरुश्रृंखला कहा जाता है।

शिखर का अंतिम बिंदु भक्त को आकाश और देवत्व की ओर संकेत करता है। यह Nagar Shaili की सबसे ऊर्जस्वित विशेषता है।

4.2 आमालक (ऊर्जा का वृत्ताकार मुकुट)

Nagar Shaili में शिखर के शीर्ष पर रखा जाने वाला बड़ा गोलाकार पत्थर आमालक होता है। यह कई लहरदार खंडों वाला होता है, जो धूप की किरणों में चमकता है।

मेरे अनुभव में आमालक केवल सजावट नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय चक्र और निरंतर ऊर्जा प्रवाह का प्रतीक माना जाता है। जब भी मैंने प्राचीन मंदिरों में ऊपर देखा, तो आमालक शिखर को स्थिरता और पवित्रता देते हुए दिखा।

यह मंदिर की ऊर्ध्व संरचना को संतुलित भी करता है और शिखर को दृश्य रूप से पूर्ण बनाता है।

4.3 कलश (मंदिर की आत्मा का अंतिम स्पर्श)

आमालक के ऊपर रखा जाने वाला कलश मंदिर का प्रतीकात्मक मुकुट है। यह अक्सर धातु (ताँबा, सोना, मिश्रधातु) का होता है। कलश मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समान होता है। प्राचीन परंपराओं में इसे ‘पूर्णता’, ‘जीवन-ऊर्जा’ और ‘अमृत’ का प्रतीक माना गया है।

कई जगहों पर यह दिशा-चिह्न के रूप में भी काम करता है क्योंकि चमकदार कलश दूर से दिखाई देता है और तीर्थयात्रियों को मंदिर तक पहुंचने का मानचित्र बन जाता है।

4.4 गर्भगृह – मंदिर का सबसे पवित्र भाग

Nagar Shaili की सबसे महत्वपूर्ण जगह गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) है। गर्भगृह मंदिर का सबसे पवित्र कमरा है। जब मैंने स्वयं गर्भगृहों में प्रवेश किया, तो देखा कि इनका वायुरोधन कम होता है, रोशनी हल्की होती है, और वातावरण गहरा शांत। यह सब मिलकर एक आध्यात्मिक अनुभव बनाते हैं।

गर्भगृह में मूर्ति को पूर्व दिशा की ओर रखा जाता है। नागर शैली में यह शिखर के ठीक नीचे होता है। ताकि प्राकृतिक प्रकाश का पहला स्पर्श देवता को मिले। गर्भगृह छोटे आकार का होता है। क्योंकि इसे अत्यधिक पवित्र माना गया है।

दीवारें मोटी और अंधेरी होती हैं। अंदर रोशनी कम आती है, जो रहस्यमय बनाती है।टेस्टबुक जितना छोटा स्थान, उतना अधिक केंद्रित आध्यात्मिक बल।

4.5 महा-मंडप (भक्तों की सभा और ऊर्जा का केंद्र)

गर्भगृह के सामने स्थित महा-मंडप Nagar Shaili का सामाजिक-धार्मिक केंद्र होता है। मैंने कई मंदिरों में देखा कि महा-मंडप में स्तंभ, सुर्खियां और ओपन स्पेस का संतुलन अद्भुत होता है। यहां भक्त एकत्र होते हैं, कीर्तन होते हैं और अनुष्ठान के लिए तैयारी होती है।

महा-मंडप को इस प्रकार बनाया जाता है कि ध्वनि प्रतिध्वनि और वायु संचरण दोनों आसान रहें। यह वास्तुकला और धार्मिक अनुभव का संगम है।

4.6 अर्ध-मंडप (संक्रमण क्षेत्र का महत्व)

महा-मंडप और गर्भगृह के बीच स्थित अर्ध-मंडप को मैं “आध्यात्मिक संक्रमण-स्थल” कहता हूं। जब व्यक्ति यहां पहुंचता है, तो वह बाहरी संसार से अलग होकर देवत्व के अधिक करीब आ जाता है।

अर्ध-मंडप का आकार छोटा होता है और इसका उपयोग प्रतीकात्मक रूप से मन और आत्मा को स्थिर करने के लिए किया जाता है।

4.7 जागती (मंदिर की ऊँची चबूतरी)

Nagar Shaili में जागती मंदिर का सबसे निचला हिस्सा है। यह ऊँचा मंच होता है, जो मंदिर को जमीन से ऊपर उठाता है। जागती मंदिर की नींव की तरह काम करती है। इससे मंदिर मजबूत रहता है और भक्त आसानी से चढ़ सकते हैं।

नागर शैली में जागती चौकोर या आयताकार होती है। ऊपर कई पट्टियाँ बनी होती हैं। जब मैं राजस्थान के मंदिरों में गया, तो पाया कि जागती मंदिर को ऊँचाई देती है ताकि वह आसपास से अलग दिखाई दे।drishtiias

यह ऊँचाई पवित्रता का संकेत है और साथ ही सुरक्षा भी प्रदान करती है। इसके सहारे मंदिर में चारों ओर से प्रदक्षिणा भी की जा सकती है। जागती मंदिर के भार को भी संतुलित करती है और मिट्टी की नमी से मुख्य संरचना को बचाती है।

4.8 प्रदक्षिणा-पथ (आध्यात्मिक चक्र)

Nagar Shaili का एक बड़ा प्रभाव प्रदक्षिणा-पथ में भी दिखता है। कई मंदिरों में गर्भगृह के चारों ओर एक घेराकार मार्ग बनाया जाता है, जहां भक्त दक्षिणावर्त चलकर पूजा करते हैं। यह मार्ग मानसिक एकाग्रता को गहरा करता है।

अपने अनुभव में, मैंने देखा कि प्रदक्षिणा-पथ का आकार और चौड़ाई मंदिर की उम्र और शैली के अनुसार बदलते हैं, लेकिन उसका धार्मिक महत्व हर जगह समान है।

4.9 पीठ (आधार का मजबूत विज्ञान)

मंदिर का पीठ (Plinth/Base) वह हिस्सा है जो पूरी संरचना का भार संभालता है। Nagar Shaili में पीठ को बहुत मजबूत बनाया जाता है, खासकर पत्थर की परतों से। मैंने कई बार देखा है कि पीठ पर ज्यामितीय आकृतियाँ, पुष्प-नक़्क़ाशी और रक्षा-शिलाएँ बनी होती हैं।

यह न सिर्फ सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि भूकंपीय कंपन में मंदिर को स्थिर भी रखते हैं—यह प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

4.10 वाहन (देवता की सवारी का प्रतीक

वाहन भगवान की सवारी है। मंदिर के प्रवेश द्वार या गर्भगृह के आगे देवता का वाहन रखा जाता है। जैसे शिव का नंदी, विष्णु का गरुड़, सूर्य का अरुण। वाहन भक्त और देवता के बीच संवाद जैसा होता है। Nagar Shaili में वाहन पीठ के साथ जुड़ा होता है।

कई स्थानों पर मैंने देखा कि वाहन मंदिर के स्थापत्य का भावनात्मक केंद्र होता है क्योंकि भक्त पहले उसी के सामने नतमस्तक होते हैं। मंदिरों में वाहन बाहर भी रखे जाते हैं।testbook

4.11 नागर शैली के अन्य महत्वपूर्ण प्रभाव

4.11.1 अन्तरा, Antarala (महा-मंडप और गर्भगृह को जोड़ने वाली पवित्र कड़ी)

अन्तरा वह छोटा गलियारा होता है जो महा-मंडप को गर्भगृह से जोड़ता है। इसे मंदिर का “आध्यात्मिक द्वार” माना जाता है। जब व्यक्ति अन्तरा में प्रवेश करता है, तो उसकी मनःस्थिति स्वतः बदलने लगती है। यह आध्यात्मिक तैयारी का चरण है।

कई स्थानों पर यहाँ सुंदर स्तंभ, लता-वलय, देव-आकृतियाँ और काष्ठ या पत्थर की शिलाएँ बनाई जाती हैं। Nagar Shaili में अन्तरा का संकुचित आकार देवत्व के प्रति सम्मान दर्शाता है।

4.11.2 रेखा-देउल / शिखर की रेखाएँ (ऊर्ध्व दिशा की ऊर्जा)

Nagar Shaili के शिखर पर बनी ऊर्ध्व रेखाएँ मंदिर की पहचान को और तीखा बनाती हैं। ये रेखाएँ ऊपर की ओर जाती हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक हैं। जब सूरज की रोशनी इन पर पड़ती है, तो मंदिर दिव्य चमक से भर उठता है।

ये रेखाएँ ‘रिब्ड स्ट्रक्चर’ बनाती हैं, जिससे शिखर ऊँचा और लंबवत दिखता है।

4.11.3 उप-शिखर, Urushringa (मुख्य शिखर के साथ छोटे सहायक शिखर)

मुख्य शिखर के चारों ओर छोटे-छोटे शिखर बनाए जाते हैं जिन्हें उरुश्रृंग या उप-शिखर कहा जाता है। मैंने खजुराहो और ओसियां के मंदिरों में इसका अद्भुत संतुलन देखा। ये छोटे शिखर मुख्य शिखर को दृश्य गहराई देते हैं, जैसे पहाड़ों की शृंखला।

इससे मंदिर की संरचना और भी ऊर्जावान और विशाल दिखती है।

4.11.4 रथिका, Rathika (दीवारों पर उभरी हुई रेखाएँ और आवर्तन)

Nagar Shaili में गर्भगृह और शिखर की दीवारों पर उभरी हुई लंबवत धारियाँ और आवर्तन होते हैं, जिन्हें रथिका कहा जाता है। ये मंदिर को बहुभुजाकार रूप देती हैं। रथिका का उद्देश्य मंदिर को एकरूपता से बाहर निकालकर उसे कई कोणों से सुंदर बनाना है।

जब प्रकाश इन सतहों पर पड़ता है, तो मंदिर मानो जीवंत हो उठता है।

4.11.5 देवल, Sanctum Tower Type (विभिन्न रूपों में पवित्रता का प्रतीक)

Nagar Shaili में कई प्रकार के देवल प्रयुक्त होते हैं—जैसे रेखा देउल, भद्र देउल, पञ्चरथ, सप्त रथ आदि। प्रत्येक का अपना अलग महत्व है। उदाहरण के लिए पञ्चरथ देउल में पाँच उभरी रेखाएँ होती हैं, जो मंदिर को अत्यधिक शक्तिशाली और स्थिर बनाती हैं।

इन देउलों की निर्माण-रचना कई बार स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और उपलब्ध पत्थरों के अनुसार भी बदलती है।

4.11.6 अलंकरण, Ornamentation (मूर्तिकला की गहराई)

Nagar Shaili में अलंकरण को बहुत महत्व दिया गया है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर—

  • देवताओं की मूर्तियाँ
  • अप्सराएँ
  • गंधर्व
  • ललकर्ण शैली की नारी-प्रतिमाएँ
  • पुष्प-लता
  • ज्यामितीय पैटर्न

स्पष्ट दिखाई देते हैं। मैंने स्वयं महसूस किया है कि इन मूर्तियों में एक तरह की “कथा” छिपी होती है—प्रत्येक आकृति मंदिर के धार्मिक–सांस्कृतिक कथा-चक्र को कहती है।

4.11.7 गर्भगृह की छत (ऊर्ध्व ऊर्जा को केंद्रित करने वाला घेरा)

Nagar Shaili के गर्भगृह की छत आमतौर पर पिरामिडनुमा या कारतल (corbelled) होती है। यह छत भीतर आने वाली ऊर्जा को ऊपर शिखर की दिशा में ले जाती है। पत्थर की परतें ऊपर की ओर जाती हैं, जैसे किसी शक्ति-केंद्र का निर्माण हो।

डिज़ाइन इस तरह किया जाता है कि ध्वनि और धूप दोनों नियंत्रित रूप से गर्भगृह में प्रवेश कर सकें।

4.11.8 प्रवेश द्वार, Doorframe (अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी)

Nagar Shaili का द्वार मंदिर की पहली कहानी कहता है। चौखट पर—

  • गंगा-यमुना की मूर्तियाँ
  • कीर्तन दृश्य
  • नवरत्न
  • यक्ष-यक्षिणी
  • ज्यामितीय बंधन

लगभग हर मंदिर में मिल जाते हैं। मैंने गुजरात और मध्य भारत के मंदिरों में ऐसा देखा है कि द्वार को मंदिर की “रक्षा-रेखा” माना जाता है। इसलिए इसे बेहद सुंदर और पवित्र बनाया जाता है।

4.11.9 मूर्ति की स्थापना दिशा (सूर्य और ऊर्जा के साथ तालमेल)

Nagar Shaili में गर्भगृह की मूर्ति हमेशा पूर्व दिशा की ओर रखी जाती है। जब सुबह की पहली किरण मूर्ति को छूती है, तो वह मंदिर को जीवंत बनाती है। यह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

सूर्य-ऊर्जा को सीधे देव-विग्रह पर पड़ने देना भारतीय मंदिर-निर्माण का अत्यंत प्राचीन सिद्धांत है।

4.11.10 वेदिका और यज्ञ-कुंड (पूजा-पद्धति की आधार-रेखा)

कई मंदिरों में गर्भगृह या मंडपों के पास वेदिका और छोटी यज्ञ-आकार की संरचनाएं दिखाई देती हैं। ये वैदिक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों का प्रतीक हैं। वेदिका अक्सर साधारण दिखती है लेकिन इसका उपयोग विशेष पूजा, अर्चना, और ‘अभिषेक’ कर्मों के लिए होता है।

4.11.11 स्तंभ, Pillars (संतुलन और कला का अद्भुत संगम)

Nagar Shaili के स्तंभों की दो प्रमुख विशेषताएँ होती हैं—

  1. स्थिरता
  2. सजावट

मैंने कई स्तंभों पर गंधर्व, अप्सरा, किन्नर और स्थानीय वनस्पतियों की नक्काशी देखी। ये स्तंभ महा-मंडप और अर्ध-मंडप को स्थिरता देते हैं और वायुसंचार को भी सहज रखते हैं।

4.11.12 छतरी या मंडपिका (देवत्व का प्रतीकात्मक विस्तार)

शिखर से अलग, मंदिर परिसर में छोटी-छोटी छतरियाँ या मंडपिकाएँ भी बनाई जाती हैं। ये वातावरण को संतुलित करती हैं और मंदिर की दृश्य-ऊर्जा को फैलाती हैं। छतरियाँ प्रायः चार या आठ स्तंभों पर खड़ी होती हैं और उनके ऊपर छोटा शिखर होता है।

4.11.13 परकोटा, Prakara (सुरक्षा और पवित्रता की सीमा)

कई मंदिरों के चारों ओर परकोटा या दीवार बनाई जाती है। यह मंदिर की सीमाओं की रक्षा के लिए होता है। मैंने राजस्थान में देखा है कि यह परकोटा कई बार मंदिर को प्राकृतिक आपदाओं या जानवरों से भी बचाता था।

4.11.14 तोरण (विजयी प्रवेश का सूचक)

Nagar Shaili में कई मंदिरों के सामने तोरण बनाए जाते हैं। दो स्तंभ और ऊपर संतुलित बीम। यह शुभ-प्रवेश का प्रतीक है। तोरण की नक्काशी मंदिर की कथा को संक्षेप में बताती है।

4.11.15 ध्वज-स्तंभ (आस्था का प्रतीक) | Nagar Shaili

मंदिर के सामने कभी-कभी ऊँचा ध्वज-स्तंभ लगाया जाता है, जिस पर देवता का ध्वज फहरता है। यह भक्त को दूरी से ही मंदिर की पहचान देता है।

5. पंचायतन शैली ( नागर शैली की एक उप-शैली )

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चित्र 6. यह मंदिर पंचायतन शैली को परिभाषित करता है

5.1 पंचायतन शैली का परिचय

पंचायतन शैली Nagar Shaili की एक प्रसिद्ध उप-शैली है, जिसमें मंदिर का डिजाइन चार दिशाओं में छोटे उप-मंदिरों के साथ बनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य मुख्य देवालय को केंद्र में रखकर संतुलित धार्मिक परिसर बनाना है।

यह शैली उत्तर भारत के मंदिरों में दिखाई देती है, जहाँ शिखर, गर्भगृह और मंडप एक साथ होते हैं। मैंने खजुराहो और ओसियां के मंदिरों में पंचायतन योजना का सुंदर उदाहरण देखा है, जहाँ पाँचों संरचनाएँ एक ही मंच पर हैं।

5.2 पंचायतनन शैली की संरचना और मुख्य विशेषताएँ

पंचायतन शैली की खासियत यह है कि इसमें पाँच मंदिर एक चौकोर योजना में होते हैं—केंद्र में मुख्य मंदिर और चारों कोनों पर छोटे उप-मंदिर। इसे नागर शैली के विकास का उच्चतम स्तर माना जाता है। यह वैदिक “मंडल” से प्रेरित है, जिसमें ऊर्जा केंद्र से फैलती है।

इस शैली में शिखर ऊँचे होते हैं ताकि दूर से भी मुख्य मंदिर की पहचान हो सके। मंदिर परिसर में संतुलित व्यवस्था होती है, जिससे यह देखने में सुंदर लगता है। पाँचों मंदिर एक मंच पर होने के बावजूद मुख्य देवालय की गरिमा सबसे ज्यादा होती है।

5.3 पंचायतन शैली के उत्कृष्ट उदाहरण

भारत के कई स्थानों पर पंचायतन शैली के अच्छे उदाहरण मिलते हैं। खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर, ओसियां के सूर्य मंदिर और उत्तर प्रदेश के प्राचीन मंदिरों में यह शैली दिखाई देती है।

स्थानीय इतिहासकारों का कहना है कि बुंदेलखंड और राजस्थान में इस शैली ने मंदिर निर्माण की नई पहचान दी। मैंने ओसियां के ओसियामाता परिसर में भी यह शैली देखी है, जहाँ मुख्य गर्भगृह के चारों कोनों पर छोटे मंदिर हैं।

5.4 नागर शैली और पंचायतन योजना का संबंध

पंचायतन शैली Nagar Shaili की एक शाखा है। नागर शैली का मुख्य तत्व शिखर है, और पंचायतन शैली इसे पाँच संरचनाओं में विस्तारित करती है। नागर शैली के सिद्धांत जैसे रेखा शिखर, टियरड संरचना, आमालक और कलश पंचायतन योजना में भी होते हैं।

5.5 धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

पंचायतन शैली केवल स्थापत्य योजना नहीं है, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से भी जुड़ी है। पाँच मंदिर “पंच देव उपासना” की परंपरा को दर्शाते हैं, जिसमें मुख्य देवता के साथ चार अन्य देवताओं को समान सम्मान मिलता है।

पाँचों मंदिरों का समूह “पूर्ण ब्रह्मांडीय संरचना” का संकेत देता है, जहाँ केंद्र में परम शक्ति और चारों ओर विभिन्न ऊर्जा होती है। यह अवधारणा नागर शैली की आध्यात्मिक भूमिका को और भी गहरा बनाती है।

6. भारत के अनेक इलाकों में नागर शैली के मंदिर 

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चित्र 7. मध्य प्रदेश में नागर शैली में निर्मित मंदिर

भारत के विविध भौगोलिक क्षेत्रों—मध्य भारत, पश्चिमी भारत और पूर्वी भारत—में Nagar Shaili के मंदिर अपनी विशिष्ट संरचना, ऊर्ध्वगामी शिखरों, गहरी प्रतीकात्मकता और अद्भुत कलात्मकता के कारण अलग पहचान रखते हैं।

अनेक भ्रमणों के दौरान मैंने महसूस किया कि नागर शैली केवल एक स्थापत्य नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रवाह है जो क्षेत्रीय परंपराओं के साथ मिलकर एक अनोखा रूप लेता है। नागर शैली भारतीय मंदिर वास्तुकला राजस्थानी वास्तुकला में उपयोग की जाने वाली।

तीन प्रमुख शैलियों में शामिल है। यह शैली उत्तर भारत की मुख्य धरोहर मानी जाती है, परंतु इसकी गूंज भारत के कई हिस्सों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जिसे कई शोधकर्ताओं ने भी स्वीकार किया है. आर्किटेक्चरल सर्वे, भारतीय पुरातत्व रिपोर्ट आदि शामिल है।

इन क्षेत्रों में मौजूद नागर मंदिरों की बनावट, शिल्प, पवित्रता और स्थानीय सौंदर्य एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होते हुए भी एक साझा आध्यात्मिक धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

6.1 मध्य भारत में नागर शैली – पत्थर और सौंदर्य की सबसे संतुलित अभिव्यक्ति

मध्य भारत—विशेषकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़—Nagar Shaili के कुछ सबसे उत्कृष्ट मंदिरों का घर है। खजुराहो का समूह नागर शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। जहाँ मंदिरों के शिखर पर्वत की तरह ऊपर उठते हैं।

और गर्भगृह से लेकर महा-मंडप तक हर भाग एक तालमेल में बनाया गया है। मध्य भारत में नागर शैली के मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ नक्काशी अत्यंत सूक्ष्म है, परंतु संरचना अत्यंत मजबूत।

रेतीले और बलुआ पत्थर पर उकेरी गई अप्सराएँ, देव-प्रतिमाएँ और रथिका आधारित दीवारें मंदिरों को बहुभुजाकार बनाती हैं। मेरे निजी अनुभव में, खजुराहो, अमारकंटक, चंदला और ओंकारेश्वर के मंदिरों में यह शैली प्रकृति के साथ पूरी तरह घुली हुई लगती है।

यह क्षेत्र अत्यधिक वर्षा और घने वनों वाला है, इसलिए पत्थरों का संरक्षण भी मंदिर निर्माण में विशेष ध्यान से किया गया। जब मैं इन मंदिरों में गया तो पाया कि यहाँ मंदिर की हर दीवार किसी कथा का विस्तार है।

और पूरा परिसर शांत लेकिन जीवंत ऊर्जा से भर हुआ महसूस होता है।

उदाहरण:-

(1) खजुराहो के मंदिर मध्य प्रदेश (MP): विश्व-स्तरीय परिपक्व नागर शैली।

(2) Kali Mata Mandir Ujjain: सरल नागर शिखर।

(3) Mahakaleshwar Temple Ujjain: मुख्य संरचना नागर पर आधारित।

(4) कंदारिया महादेव मंदिर (खजुराहो)—यह मंदिर नागर शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। इसका ऊँचा शिखर, बारीक मूर्तिकला और मंडप इसके गौरव को दर्शाते हैं।

(5) लक्ष्मण मंदिर (खजुराहो)—इसमें पाँच-स्तरीय शिखर और सुंदर जंघा नक्काशी नागर शैली की परिपक्वता को दिखाती है।

(6) विश्वनाथ मंदिर (खजुराहो)—शिखरों का समूह स्वरूप (Clustered Shikhara) यहाँ की विशिष्टता है।

(7) सूर्य मंदिर (ग्वालियर किला परिसर)—सुस्पष्ट रेखा शिखर और विस्तृत समर्पित योजना इसे खास बनाती है।

(8) चतुर्भुज मंदिर (ओरछा)—यद्यपि इसका मिश्रित रूप है, पर शिखर की ऊर्ध्व दिशा नागर शैली को दर्शाती है।

(9) भोजेश्वर मंदिर (भोजपुर)—अधूरा होने के बावजूद इसका विशाल शिखर आधार नागर शैली की शक्ति को दर्शाता है।

(10) अशापुरी मंदिर समूह (भोपाल के पास)—यहाँ के खंडहर नागर शैली की विविधता और विकास के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

6.2 पश्चिमी भारत में नागर शैली – व्यापार, मौसम और शिल्प का अनोखा संगम

Nagar Shaili

पश्चिमी भारत—विशेषकर राजस्थान और गुजरात—Nagar Shaili का केंद्र माना जाता है। इस क्षेत्र में मंदिरों की संरचना न केवल धार्मिक और कला दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि जलवायु और व्यापारिक जीवन ने भी इन्हें प्रभावित किया है।

राजस्थान की शुष्क जलवायु ने मंदिरों की दीवारों को अधिक मोटा, अधिक स्थिर और अपेक्षाकृत खुला बनाया ताकि गर्मी और रेत दोनों से सुरक्षा बनी रहे। ओसियां, किराडू, नागदा, बाराहट और चिंतामन में स्थित मंदिरों के दर्शन करते समय।

मैंने महसूस किया कि यहाँ की वास्तुकला सूर्य के तेज प्रकाश और रेतीले वातावरण को ध्यान में रखकर विकसित हुई है। शिखर ऊँचे होते हैं, परंतु पत्थरों का बंधन बहुत मजबूत और कोणीय होता है।

गुजरात में Nagar Shaili और भी विकसित रूप में मिलती है। पश्चिमी भारत में नागर शैली अक्सर ‘अन्वय-नागर’ या स्थानीय नागर रूप में परिवर्तित हो जाती है, जहाँ शिखर का आकार बेलनाकार और अलंकरण थोड़ा हल्का दिख सकता है।

पत्थरों पर उकेरी गई धातु-नुमा धारियाँ और काँच जैसी चमकदार सतहें यह दर्शाती हैं कि इस क्षेत्र में कारीगरों ने निर्माण की कला को एक साधना की तरह अपनाया था।

उदाहरण:

(1) Nakoda Ji Rajasthan: जैन नागर शैली।

(2) एकलिंगजी मंदिर उदयपुर: परंपरागत नागर योजना।

(3) Khatu Shyam Temple Sikar – आधुनिक नागर शैली आधारित।

(4) Ranakpur Jain Mandir Pali – अग्रिम नागर–जैन स्थापत्य।

(5) Mahakali Mandir Pavagadh – रेखा-शिखर आधारित नागर शैली।

(6) Charbhuja Ji Temple Garhbor Rajsamand – पारंपरिक नागर शैली।

(7) Dilwara Jain Mandir mount Abu – अत्यंत परिष्कृत नागर शैली।

(8) ओसियां का सूर्य मंदिर (जोधपुर)—नागर शैली की रेखा-शिखर और पंचायतन योजना का उत्कृष्ट मिश्रण।

(9) मोडेरा सूर्य मंदिर (गुजरात)—यह नागर शैली के सबसे परिपक्व और भव्य उदाहरणों में से एक है।

(10) अक्षरधाम मंदिर (गांधीनगर)—आधुनिक होते हुए भी इसका डिजाइन प्राचीन नागर शैली से प्रेरित है।

6.3 पूर्वी भारत में नागर शैली – स्थानीय परंपरा और नागर मूल को एक साथ लेकर चलने वाली शैली

Nagar Shaili

पूर्वी भारत—विशेषकर ओडिशा, झारखंड और बिहार—में Nagar Shaili को कई बार “कलिंग शैली” कहा जाता है, लेकिन इसका मूल नागर लक्षणों से गहरा संबंध है। ओडिशा के भुवनेश्वर, कोणार्क और पुरे क्षेत्र में नागर शैली का प्रभाव स्पष्ट दिखता है।

परंतु यहाँ शिखर ज्यादा गोलाकार, ऊँचे और घुमावदार पट्टियों के साथ बनाए जाते हैं। इस क्षेत्र में बने मंदिरों का गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा लेकिन अत्यंत पवित्र होता है, और जगमोहन अपेक्षाकृत बड़ा, जो समुदायिक पूजा की भावना को दर्शाता है।

मैंने लिंगराज मंदिर, मुक्तेश्वर मंदिर और राजारानी मंदिर में यह अनुभव किया कि पूर्वी भारत की नागर परंपरा मूर्तिकला में सबसे समृद्ध है। यहाँ के मंदिरों की दीवारें मूर्तियों से इतनी सजी होती हैं कि पूरी संरचना मानो एक जीवित ग्रंथ लगती है।

इसके अलावा, ओडिशा के मंदिरों का शिखर (रेखा देउल) और मंडप (पिड़ा देउल) Nagar Shaili के मूल सिद्धांतों को स्थानीय कलिंग भाव के साथ मिलाकर प्रस्तुत करते हैं।

नक्काशी में पौराणिक कथाएँ, नृत्य-शैलियाँ, मिथकीय जीव और ग्रामीण जीवन के दृश्य भी शामिल होते हैं, जिनसे लगता है कि मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक अभिलेखागार भी है।

(1) लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर)—कलिंग नागर शैली का सर्वोच्च उदाहरण। इसका विशाल शिखर दूर से दिखाई देता है।

(2) मुक्तेश्वर मंदिर (भुवनेश्वर)—तोरण और जाली-नक्काशी इसे “पूर्व का रत्न” कहा जाता है।

(3) राजारानी मंदिर (भुवनेश्वर)—लाल व पीले पत्थरों में बनी इसकी मूर्तिकला अनुपम है।

(4) परशुरामेश्वर मंदिर (भुवनेश्वर)—पूर्वी नागर शैली की शुरुआती कृतियों में गिना जाता है।

(5) सूर्य मंदिर (कोणार्क)—विश्व प्रसिद्ध कलिंग नागर शैली का भव्यतम उदाहरण।

(6) वैतल देउल (भुवनेश्वर)—यद्यपि इसका शीर्ष अनोखा है, पर अधिकांश योजना नागर परंपरा में आती है।

(7) रामचंडी मंदिर (पुरी मार्ग)—इसका वर्गाकार गर्भगृह और शिखर नागर शैली की पहचान है।

(8) अनंत वासुदेव मंदिर (भुवनेश्वर)—परंपरागत देउल और मंडप योजना को स्पष्ट रूप में दिखाता है।

(9) ब्राह्मेश्वर मंदिर (भुवनेश्वर)—इसकी मूर्ति सजावट कलिंग नागर शैली का परिपक्व उदाहरण है।

(10) सिद्धेश्वर मंदिर (भुवनेश्वर)—शिखर, जंघा और पाद का अनुपात नागर शैली की गहराई दर्शाता है।

6.4 नागर शैली का क्षेत्रीय विस्तार (एक अखंड पहचान)

भारत की विविध भूमि पर फैली Nagar Shaili यह दर्शाती है कि कैसे एक ही स्थापत्य सिद्धांत विभिन्न परिस्थितियों में अनुकूलित होकर अलग सौंदर्य पैदा कर सकता है। मध्य भारत में यह शैली पर्वतीय वन्य परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करती है।

पश्चिमी भारत में यह व्यापारिक–मरुस्थलीय जीवन से तालमेल बनाती है, जबकि पूर्वी भारत में यह जलवायु, समुद्री हवाओं और सांस्कृतिक मिश्रण के कारण अधिक समृद्ध और अलंकृत बन जाती है।

मैंने कई पुरातात्विक दस्तावेज़ों में पाया कि Nagar Shaili की यह विविधता इसकी सबसे बड़ी ताकत है। और यह भारत के सांस्कृतिक विकास की निरंतरता को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है।

7. नागर शैली पर निष्कर्ष | Conclusion on Nagara Style

Nagar Shaili उत्तर भारत की एक प्रमुख मंदिर वास्तुकला है। जो मंदिर की संरचना को दर्शाती है। जिसमें पूरे मंदिर का एक स्वरूप नागर शैली में बना होता है। जिनमें नागर शैली में बने मंदिर के कई भाग ( हिस्से ) होते है।

यह ऊँचे, पिरामिडनुमा शिखर और जटिल नक्काशी के लिए जानी जाती है। इसी दौरान, नागर शैली में मंदिर का एक स्ट्रक्चर बनकर तैयार होता है। नागर शैली के मंदिरों की योजना आमतौर पर वर्गाकार होती है, जो पूरी तरफ नागर शैली को दर्शाती है।

Nagar Shaili में मंदिर का गर्भगृह शिखर के नीचे होता है।विकिपीडिया

और मंदिर ऊँचे मंच पर बनाए जाते हैं। इसकी खासियत विभिन्न शिखर संरचनाएँ हैं, जैसे रेखा-प्रसाद, शेखरी, भूमिज़ा, वल्लभी और फमसाना, जो Nagar Shaili को विशेष बनाती हैं। नागर शैली में मंदिर की योजना आमतौर पर वर्गाकार या आयताकार होती है।

और इसका प्रसार हिमालय से विंध्य माला तक है। “नागर शैली,” “मंदिर वास्तुकला,” “शिखर,” “उत्तर भारत,” और “नक्काशी” का संतुलित और प्राकृतिक उपयोग महत्वपूर्ण है।

इसका सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व, जैसे खजुराहो और अन्य प्रमुख मंदिरों का उल्लेख, सामग्री को और गहरा बनाता है। Nagar Shaili की मुख्य वास्तुकला विशेषताओं, क्षेत्रीय विविधताओं और ऐतिहासिक प्रसार को शामिल करना चाहिए।

8. नागर शैली पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | FAQs on Nagara Style Temples

प्रश्न 1. नागर शैली क्या है?

उत्तर: नागर शैली भारत की उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला शैली है जिसमें मंदिरों के शिखर ऊँचे, सीढ़ीनुमा और वक्राकार होते हैं। यह मुख्यतः गंगा के उत्तर के क्षेत्रों में विकसित हुई।

प्रश्न 2. नागर शैली का उद्भव कब माना जाता है?

उत्तर: Nagar Shaili का विकास गुप्त काल (4th–6th century CE) से माना जाता है, और यह मध्यकाल में अपनी चरम अवस्था पर पहुँची।

प्रश्न 3. नागर शैली के मुख्य भू-क्षेत्र कौनसे हैं?

उत्तर: उत्तर भारत, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हिमालयी क्षेत्र और ओडिशा इसके प्रमुख केंद्र हैं।

प्रश्न 4. नागर शैली में मंदिर का प्रमुख हिस्सा क्या कहलाता है?

उत्तर: मंदिर का मुख्य और ऊँचा भाग शिखर कहलाता है, जो इस शैली की पहचान है।

प्रश्न 5. Nagar Shaili के शिखर की प्रमुख विशेषता क्या है?

उत्तर: शिखर ऊँचा, गोलाई लिए हुए, वक्र रेखाओं वाला और ‘रेखा-प्रासाद’ जैसा होता है।

प्रश्न 6. क्या नागर शैली में गर्भगृह होता है?

उत्तर: हाँ, नागर शैली के मंदिरों में गर्भगृह (Garbhagriha) अवश्य होता है जहाँ प्रमुख मूर्ति स्थापित रहती है।

प्रश्न 7. नागर शैली में मंडप क्या होता है?

उत्तर: मंडप वह सभा-भाग या सभा-मंडप होता है जहाँ भक्त एकत्रित होकर पूजा-अर्चना करते हैं।

प्रश्न 8. नागर शैली के शिखर के ऊपर क्या स्थित होता है?

उत्तर: शिखर के शीर्ष पर आमलक (Amalaka) तथा उसके ऊपर कलश (Kalasha) स्थित होता है।

प्रश्न 9. नागर शैली में कितने उप-प्रकार होते हैं?

उत्तर: तीन प्रमुख प्रकार होते हैं:
(1) रेखा-प्रसाद
(2) रेखा-प्रसादफानसाना (फंसाना)
(3) वेसर शैली (मिश्र शैली)

प्रश्न 10. नागर शैली और द्रविड़ शैली में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: Nagar Shaili में शिखर ऊँचे व वक्राकार होते हैं, जबकि द्रविड़ शैली में शिखर पिरामिडनुमा और क्षैतिज स्तरों में बनते हैं।

प्रश्न 11. नागर शैली के मंदिर की दीवारों पर किस प्रकार की नक्काशी होती है?

उत्तर: इसमें देव-मूर्तियाँ, मिथक, कंदरे, कर्ण-कुड, अलंकरण, और उभरी हुई आकृतियों की सूक्ष्म नक्काशी होती है।

प्रश्न 12. नागर शैली के प्रमुख मंदिरों के उदाहरण कौन-कौन से हैं?

उत्तर: खजुराहो के मंदिर, कोणार्क सूर्य मंदिर, ओसियां के मंदिर, और बड़ोली का घोड़ा मंदिर इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रश्न 13. नागर शैली में प्रवेश द्वार कैसा होता है?

उत्तर: प्रवेश द्वार सामान्यतः छोटा, साधारण और कम अलंकृत होता है, जबकि अंदर जाते-जाते संरचना अत्यंत जटिल होती जाती है।

प्रश्न 14. नागर शैली में शिल्पकार किस सामग्री का प्रयोग अधिक करते थे?

उत्तर: बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट और संगमरमर जैसी कठोर चट्टानों का प्रयोग अधिक होता है।

प्रश्न 15. क्या Nagar Shaili के मंदिर ऊँचे मंच पर बनाए जाते थे?

उत्तर: हाँ, अधिकांश नागर शैली के मंदिर ऊँचे मंच (जगती) पर निर्मित होते हैं, जिससे मंदिर का वैभव और ऊँचाई बढ़ती है।

Author: Lalit Kumar
नमस्कार प्रिय पाठकों, मैं ललित कुमार ( रवि ) हूँ। और मैं N.H.8 भीम, राजसमंद राजस्थान ( भारत ) के जीवंत परिदृश्य से आता हूँ।इस गतिशील डिजिटल स्पेस ( India Worlds Discovery ) प्लेटफार्म के अंतर्गत। में एक मालिक के तौर पर एक लेखक के रूप में कार्यरत हूँ। जिसने अपनी जीवनशैली में JNU और BHU से इतिहास का बड़ी गहनता से अध्ययन किया है। जिसमे लगभग 6 साल का अनुभव शामिल है। यही नहीं में भारतीय उपमहाद्वीप के राजवंशों, किलों, मंदिरों और सामाजिक आंदोलनों पर 500+ से अधिक अलग अलग मंचो पर लेख लिख चुका हु। वही ब्लॉगिंग में मेरी यात्रा ने न केवल मेरे लेखन कौशल को निखारा है। बल्कि मुझे एक बहुमुखी अनुभवी रचनाकार के रूप में बदल दिया है। धन्यवाद...

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