Charbhuja Ji Mandir जो अपने भक्तों के सपनों में देते है उन्हें उचित मार्गदर्शन। जिनकी स्थापना हुई लगभग 5000 साल पहले। जहां हो चुके है 125 युद्ध ओर आक्रमण।
1 चारभुजा मंदिर का परिचय | Charbhuja Ji Mandir

चारभुजा का अर्थ है। जिसकी चार भुजाएं हो। यहां मंदिर में विराजमान भगवान श्री कृष्ण की चार भुजाएं है। जिनमें चक्र, गद्दा, शंख ओर पद्य धारण किए हुए है। जिसके चलते इस मंदिर को Charbhuja Ji Mandir के नाम से जाना जाता हैं। जो यहां भगवान् विष्णु के अवतार भगवान् श्री कृष्ण है।
यहां की मूर्ति काफी प्राचीन मानी जाती है। जिसकी तुलना द्वारकाधीश मंदिर से की जाती है।
यहां चारभुजा नाथ की इस मूर्ति को राव दूदा के द्वारा इसका नाम चारभुजा घोषित कराकर। सर्वप्रथम यहां चबूतरे का निर्माण करवाया गया था। इसके बाद कालांतर में यहां भगवान् श्री कृष्ण का भव्य मंदिर बनवाया गया। जिसे हम सभी श्री Charbhuja Ji Mandir के नाम से जानते है।
जहां चारभुजा नाथ का यह भव्य मंदिर मीरा बाई मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। वही मीरा जो भगवान् श्री कृष्ण की अनन्य उपासक भी मानी जाती है। जो चित्तौड़गढ़ दुर्ग में श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहा करती थीं।
वही में आपको यह बतादु। की यह Charbhuja Ji Mandir मुख्य रूप से “भगवान श्री कृष्ण” को समर्पित है। जहां श्री चारभुजा मंदिर को सनातन धर्म के हिंदुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता हैं।
जो राजस्थान ( राज्य ) के राजसमंद जिले की कुंभलगढ़ तहसील के गढ़बोर गांव में स्थित है। जो राजस्थान ओर मेवाड़ का काफी लोकप्रिय मंदिर भी माना जाता है। जहां कुमावत वंश के लोग भगवान् श्री चारभुजा नाथ को अपने कुलदेव के रूप में पूजते है। ओर जहां प्रतिदिन हजारों की तादाद में लोग Charbhuja Ji Mandir के दर्शन करने को आते है।
2 चारभुजा मंदिर के आरती की दिनचर्या

वही Charbhuja Ji Mandir के खुलने का समय ठीक सुबह 5:00 बजे है। वही रात को ठीक 10:00 बजे के पश्चात् श्री चारभुजा नाथ मंदिर परिसर को बंद कर दिया जाता है। वही कई मौसम ओर विशेष आयोजन पर आरती की दिनचर्या में परिवर्तन देखने को मिला सकता है।
यहां श्री Charbhuja Ji Mandir की आरती ओर दर्शन का समय दिया गया है…
1 मंगला आरती
मंगला आरती का समय प्रातः 5:30 बजे से लेकर 6:30 बजे तक का है।
2 ग्वाल आरती
Charbhuja Ji Mandir में ग्वाल आरती ( बाल गोपाल के भोग के लिए ) इसका समय सुबह 8:15 बजे से 11:00 बजे तक का होता है।
3 राजभोग आरती
राजभोग आरती ( मुख्य भोग आरती ) जिसका समय दोपहर 11:30 से लेकर। 3:45 बजे तक का है।
4 संध्या आरती
Charbhuja Ji Mandir में संध्या भोग के साथ। संध्या आरती का समय रात 7:00 तक का है।
5 सयान आरती
सयान आरती का समय रात के 9:00 बजे तक का है।
इस अवधि दर्शनार्थी ओर भक्तजन Charbhuja Ji Mandir में दर्शन पूजन करते है। जहां भक्तों का जन सैलाब उमड़ता है। यदि कोई भक्तगण तह दिल से भगवान को प्रार्थना करता है। तो उसकी इच्छाएं पूर्ण होती है।
3 चारभुजा मंदिर का निर्माण एवं वास्तुशिल्प

वही Charbhuja Ji Mandir में स्थित मूर्ति की स्थापना पांडवों के द्वारा। लगभग 5,200 साल पहले की गई थी। जब उस वक्त पाण्डवों का वनवास चल रहा था। जब पाण्डव वनवास काट के जा रहे थे। तब उन्हें इस मूर्ति को जलमग्न कर दिया था।
इसके बाद गंगदेव द्वारा मूर्ति को निकालकर। पुनः स्थापित किया गया था। ओर मंदिर का पुनः निर्माण राजपूत शासक गंगदेव द्वारा करवाया गया था। चलिए में आपको गंगदेव द्वारा मूर्ति की स्थापना प्रक्रिया को विधिवत समझता हु।
ऐसा भी कहा जाता है। की गढ़बोर के तत्कालीन राजपूत शासक गंगदेव को। श्री चारभुजा नाथ ने। सपनों में एक संदेश दिया था। की मेरी यह मूर्ति जलमग्न है। उसे जल से बाहर निकालों। ओर एक मंदिर बनवाकर। उस मूर्ति को मंदिर में स्थापित करो।
इसके बाद, राजा गंगदेवी ने भी कुछ ऐसा ही किया। उन्होंने जल से प्राप्त की गई मूर्ति को। एक मंदिर में स्थापित करवा दी। जिसे हम वर्तमान में Charbhuja Ji Mandir के नाम से जानते है।
वही चारभुजा के शिलालेख के मुताबिक। सन् 1444 ईस्वी विक्रम संवत 1501 में। खरवड़ शाखा के ठाकुर महिपाल वह उनके पुत्र रावत लक्ष्मण ने। इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
चारभुजा नाथ का यह मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला के साथ सुशोधित है। जहां हमें राजस्थानी वास्तुकला का संगम देखने को मिल जाएगा। वही Charbhuja Ji Mandir के मुख्य प्रवेश द्वारा के दोनों तरफ। पत्थरों से निर्मित विशाल हाथी की प्रतिमा स्थापित है। जहां के आंगन में भगवान् गरुड़ जी विराजमान है। मंदिर के सामने जगमोहन की खुली जगह है।
जहां बैठकर लोग भगवान के प्रति आस्था में लीन रहते है। ओर भगवान को अपने तह दिल से याद करते है। यह मंदिर संगमरमर के पत्थरों द्वारा निर्मित है। जहां मंदिर के अंदर की दीवारों पर। कई महाराणाओं के चित्र प्रदर्शित है।
आखिर जैसे ही हम Charbhuja Ji Mandir के मुख्य द्वार में प्रवेश करते है। तो हमे चारों तरफ खुला आंगन ओर बीच में भगवान श्री कृष्ण का मुख्य मंदिर दिखाई देता है। मुख्य द्वारा के अंदर अनेक विशाल 2·3 मंजिला इमारतें बनी हुई है। जिसपर हर वक्त कबूतरों का आवागमन रहता है।
वही Charbhuja Ji Mandir के चारों तरफ की दीवारों पर। विशाल पेंटिंग के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण के बाल अवस्था को दिखाया गया है। जहां उनके माखन चुराने वाली तस्वीर। ओर माता यशोदा द्वारा उनको पकड़ने का चित्र।
तथा गोपियों के साथ रासलीला करने का चित्र, अर्थात् यमुना में कालिया नाग के सिर पर नृत्य करने का चित्र, गोवर्धन पर्वत को उठाने का चित्र आदि प्रदर्शित किया गया है। जो प्रतिदिन आए पर्यटकों को अपने ओर आकर्षित करते है।
4 चारभुजा मंदिर के प्रमुख स्थल
4.1 चारभुजा मंदिर परिसर | Charbhuja Ji Mandir

यदि हम Charbhuja Ji Mandir के अंदर प्रवेश करते है। तो हमे चारभुजा नाथ की 85 CM ( Centimetre ) कि ऊंची प्रतिमा देखने को मिलती है। जिसका निर्माण शीलग्राम नामक पत्थर से करवाया गया था।
जिसकी दिखावटी दिखने में काले रंग की है। वही मुख्य मूर्ति की चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गद्दा और कमल का फूल देखने को मिलता है। जिनमें…
शंख: पवित्रता ओर विजय का प्रतीक माना जाता है।
चक्र: जिसे अधर्म के नाश ओर सत्य की स्थापना का प्रतीक माना जाता हैं।
गद्दा: जिसे शक्ति और बल का प्रतीक माना जा है।
पद्य: जिसे ज्ञान और भक्ति के प्रतीक माना जाता हैं।
यह भी कहा जाता है कि सर्वप्रथम इस मूर्ति को ठाकुर के महल में रखा गया था। इसके बाद वैराह भगवान के मंदिर में इसे स्थापित कर दिया गया था।
Charbhuja Ji Mandir की यह प्रतिमा बेहद ही आकर्षक ओर मन को मोह लेने वाली है। जहां मूर्ति के चक्र, गद्दा गतिशील शक्ति, ऊर्जा ओर कौशल के प्रतीक है।
वही तलवार और ढाल को अपने शौर्य का प्रतीक मानने वाले गुर्जर। इस मंदिर के प्रति विशेष श्रद्धा रखते है। जहां संगमरमर के पत्थरों द्वारा निर्मित। इस मंदिर के अंदरूनी भाग ( गर्भगृह ) की दीवारों पर कांच और दर्पण की अनुपम कलाकारी देखते ही बनती हैं। जिसमें मंदिर के दरवाजे चांदी के धातुओं द्वारा बनवाए गए थे।
जहां मेवाड़ ओर मारवाड़ के राज्यों से भारी दान मिलने के कारण। गर्भगृह के आंतरिक शटर सोने के और बाहरी शटर चांदी के बने हुए हैं। इस Charbhuja Ji Mandir के वैभव का अनुमान। इसी बात से लगाया जा सकता है। की इस मंदिर के ज्यादातर खिड़की ओर दरवाजे चांदी से ढके हुए है।
5 श्री चारभुजा नाथ मंदिर के रहस्य और चमत्कार

1 जलझूलनी एकादशी का चमत्कार
प्रत्येक साल की जलझूलनी एकादशी के दिन पर। चारभुजा नाथ की विशाल प्रतिमा को। मंदिर से उठाकर गांव की सरोवर में स्नान करवाया जाता है। जिसमें मंदिर के पुजारी, गांव के तमाम लोग एवं भक्तगण साथ रहते है।
वही यह भी कहना है कि इस दिन भगवान की मूर्ति का वजन काफी बढ़ जाता है। जिसको उठा पाना बहुत ही मुश्किल साबित होता है। जहां भगवान के सच्चे भक्त ही उठा पाने में सफल हो पाते है। यह भी Charbhuja Ji Mandir का एक अद्भुत चमत्कार माना जाता है।
2 अद्भुत प्रतिमा का रहस्य | Charbhuja Ji Mandir
चारभुजा मंदिर परिसर में स्थापित भगवान् विष्णु की प्रतिमा के चार हाथ है। जिनमें भगवान् विष्णु शंख, गद्दा, चक्र ओर पद्य ( कमल ) धारण किए हुए दर्शाए गए है। यहां की मान्यता के अनुसार Charbhuja Ji Mandir परिसर की प्रतिमा स्वयं द्वारकाधीश श्री कृष्ण के समय की मानी जाती है। जिसकी स्थापना स्वयं भगवान् ने की थी।
3 प्रतिमा का वजन ओर स्थिरता
चारभुजा की प्रतिमा का कुल वजन 85 किलोग्राम माना जाता है। हालांकि इसे पुजारियों और भक्तों द्वारा स्पर्श करने के दौरान। यह बहुत ही हल्की महसूस होती है।
मूर्ति को हिलाने या स्पर्श करने के दौरान। एक दिव्य शक्ति का अनुभव महसूस होता है। जिसके चलते भक्तगण ओर मंदिर के पुजारी। इसे Charbhuja Ji Mandir का अद्भुत चमत्कार मानते है।
4 मंदिर के अस्त्र शस्त्र का चमत्कार
मंदिर के अंदर कई प्राचीन हथियार मौजूद है। जिन्हें देव हथियार के नाम से जानते है। मानो मंदिर में जब भी कोई असंकट आता है। तो यह सभी हथियार हिलते डुलते है। ऐसा लगता है जैसे भगवान खुद युद्ध के लिए तैयार हो।
5 अखंड ज्योति का अद्भुत रहस्य
कहा जाता है Charbhuja Ji Mandir के अंदर एक अखंड ज्योति वर्षों से निरंतर जली आ रही है। जिसे कभी भी यहां के लोगों ने बुझते हुए नहीं देखा। वहीं मूल लोगों के मुताबिक यह ज्योति विष्णु भगवान् की दिव्य उपस्थित का प्रतीक मानी जाती हैं।
6 युद्धकाल का रहस्य
यहां के इतिहास के मुताबिक। एक बार किसी आक्रमणकारी द्वारा यहां मंदिर में हमला किया गया था। वही किंवदंती है कि हमले दौरान यहां भारी मात्रा में सेना प्रकट हुई।
जिसके चलते सभी आक्रमणकारियों को हार का सामना करना पड़ा था। वही स्थानीय लोग इस चीज को Charbhuja Ji Mandir का चमत्कार मानते हैं।
7 भक्तों के सपनों में भगवान का आना
यहां की मान्यता है कि जब भी कोई मंदिर का भक्त संकट में होता है। तो भगवान उसके सपनों में आकर उस भक्त को उचित दिशा प्रदान करते है। वही स्थानीय लोग इस प्रक्रिया को भगवान का एक उचित चमत्कार मानते है।
यहां के इतिहास में भगवान कई लोगों के सपनों में आकर संदेश दिया था। जिनमें सूरज जी भगड़वाल ओर राजा गंगदेव आदि को देखा जा सकता है।
6 चारभुजा मंदिर ( श्री कृष्ण ) की पौराणिक दंतकथाएं
पाण्डवों द्वारा स्थापित मूर्ति ( श्री चारभुजा नाथ मंदिर )

यदि में बात करूं पौराणिक कथाओं की। तो पौराणिक कथाओं के अनुसार। एक बार भगवान श्री कृष्ण ने। अपने मित्र उद्धव को। हिमालय में तपस्या कर सतगति प्राप्त करने का आदेश देते हुए। स्वयं गेहुलोख ( गंगोलोख ) जाने की अच्छा जाहिर की।
तब उद्धव ने श्री कृष्ण से कहा। की मेरा तो उद्धार हो जाएगा। परंतु आपके परम भक्त पांडव वह सुदामा तो। आपके गहुलाेख जाने की खबर सुनकर। अपने प्राण त्याग देंगे।
ऐसे में श्री कृष्ण ने विश्वकर्मा से। स्वयं वह बलराम की मूर्तियां बनवाई। जिन मूर्तियों को देवराज को देकर कहा। की यह मूर्तियां पांडव युधिष्ठ है। तथा सुदामा को सुपुर्द करके उन्हें यह कहना। की यह दोनों मूर्तियां मेरी स्वयं की ही है। ओर इन मूर्तियों में खुद विराजमान हु।
तथा प्रेम पूर्वक इन मूर्तियों की पूजा अर्चना करते रहे। ओर कलयुग में मेरा पूजन वह दर्शन करने से। में खुद मनुष्यो की इच्छाएं पूर्ण करूंगा। वही भगवान श्री कृष्ण द्वारा दी गई मूर्तियों को। देवराज ने पाण्डवों वह सुदामा को सौंफ दी।
इसके बाद, पाण्डव वह सुदामा इन मूर्तियों की पूजा अर्चना करने लगे। ओर वर्तमान समय में पाण्डवों द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति। राजस्थान राज्य के राजसमंद जिले के कुंभलगढ़ तहसील के गढ़बोर गांव में स्थित है। जिसे हम आज Charbhuja Ji Mandir के नाम से जानते है।
वही दूसरी ओर सुदामा द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति। रूपनारायण के नाम से। सेवंत्री गांव में स्थित है।
कहा जाता है पाण्डवों के हिमालय में जाने से पहले। उन्होंने मूर्ति को जल मग्न किया था। ताकि इस मूर्ति की पवित्रता को कोई खंडित या बाधा न पहुंचा सके।
7 चारभुजा मंदिर का इतिहास
1 चारभुजा मंदिर पर आक्रमण

कहा जाता है Charbhuja Ji Mandir की मूर्ति को पाने के लिए। इतिहास में लगभग 125 युद्ध लड़े गए थे। ओर अनेकों आक्रमण हुए। वही इस मंदिर को तोड़ने ओर गिराने के लिए। सारे आक्रमण नाकामयाब रहे। वही मुगलों ओर औरंगजेब जैसे क्रूर शासकों से। मूर्ति को कई बार पानी में डुबोया गया।
ऐसा भी कहा जाता है। की एक बार औरंगजेब द्वारा यहां आक्रमण करके के बाद। मंदिर के आसपास स्थित मधुमक्खियों के छतों ने। उन औरंगजेब पर घातक आक्रमण किया था। इस मधुमक्खियों के छतों को उड़ाना। श्री चारभुजा मंदिर के हाथों माना जाता हैं। जो उस वक्त श्री चारभुजा नाथ का चमत्कार माना गया था।
2 चारभुजा मंदिर का नाम बद्रीनाथ होना
एक मंदिर में मिले शिलालेख के मुताबिक यह पता चलता है। की इस क्षेत्र का नाम कभी बद्री हुआ करता था। जो कि बद्रीनाथ से मिला जुला नाम है। इसीलिए यहां की मूर्ति को बद्रीनाथ के नाम से भी जाना जाता हैं।
3 सूरज जी भगड़वाल ( गुर्जर चरवाहा ) ओर चारभुजा की स्थापना

जनश्रुति के अनुसार सूरजी भगड़वाल नाम का एक गुपवंशीय था। मतलब गुर्जर चरवाहा ( पशुओं को चराने वाला ) हुआ करता था। जो अरावली पर्वतमाला के जंगलों में अपनी गायों को चराया करता था। जिनके पास एक गोरी नामक गाय भी हुआ करती थी। यह गोरी नामक गाय जो गोधूलि के वक्त। पहाड़ी के पास घूम हो जाया करती थीं।
तथा वह अपना सारा दूध जमीन पर गिराकर। पुनः झुंड में लौट आती। इससे उस गोरी नामक गाय का बछड़ा। बिना दूध के भूखा रहकर चिल्लाता रहता। वही सूरज भगड़वाल ने गोरी नामक गाय के अचानक दूध निकल जाने के पीछे का राज जानने के लिए। गोरी का पीछा किया।
जहां वह गोरी को घूरते हुए देखता है। की गोरी का दूध उसके स्तन से बाहर की ओर खींचा चला जा रहा है। इस घटना को देखते हुए। सुरजी भगड़वाल काफी हैरान हो गए। जहां वह खुद ही अपनी गलती मानकर। भगवान् से क्षमा याचना मांगने लगे।
हालांकि उसी रात को सुरजी भगड़वाल के सो जाने के पश्चात्। उनके सपनो भगवान् स्वयं पधारे। ओर कहा जहां तुम्हारी गाय दूध देती है। ठीक उसी के नीचे मेरी मूर्ति है। उस मूर्ति को बाहर निकालो। तथा मंदिर की स्थापना करवाकर वहां पूजा अर्चना की शुरुआत करो। भगवान के इतना कहने से सूरज भगड़वाल की आंखे खुल गई।
जहां सूरज जी भगड़वाल के सामने। एक बाल अवस्था में बच्चे के रूप में भगवान स्वयं प्रकट होते है। जहां वह कहते है मेरी सेवा में ही भगवान की सेवा करो। सूरज जी डरते हुए। अपनी असमर्थता वक्त करते है। हालांकि बालक रूपी प्रभु के समझाने से। सूरज जी मान गए।
जहां वह सुबह भ्रम मूर्हत में उठकर। पहाड़ी इलाके से मूर्ति को निकालके। मंदिर में मूर्ति को स्थापित कर दिया। उसी वक्त से आज तक Charbhuja Ji Mandir के पुजारी। सूरज जी भगड़वाल के परिवार से होते आए है।
4 मेवाड़ के महाराणा ओर चारभुजा की माला

कहा जाता है वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप के वंशज। उदयपुर ( City Palace ) के महाराणा। गढ़बोर में स्थित श्री चारभुजा नाथ मंदिर के दर्शन करने के लिए आते थे। जहां मंदिर का पुजारी महाराणा मेवाड़ को। भगवान् की माला उनके प्रसाद के रूप में पहना लेते थे।
वही एक बार मेवाड़ के महाराणा को। उदयपुर से आने में देरी हो गई। तो Charbhuja Ji Mandir के पुजारी देवा ने। भगवान चारभुजा नाथ जी को शयन करा दिया। ओर हमेशा की तरह महाराणा को दी जाने वाली भगवान् की माला देवा पुजारी ने स्वयं गले में धारण कर ली।
इसके बाद महाराणा स्वयं पुजारी के पास पहुंच गए। जहां पुजारी द्वारा पहनी गई माला वह उतारकर। महाराणा के गले में धारण कर लेता है।
उसी वक्त महाराणा को उस माला में सफेद बाल नजर आया। जहां महाराणा ने पुजारी से पूछा। क्या भगवान बुढ़े होने लगे है। वही पुजारी ने घबराते हुए उत्तर में हां कह दिया। पुजारी के उत्तर से असंतुष्ट महाराणा ने। पुजारी को जांच का आदेश सौंप दिया। वही दूसरे दिन भगवान के मंदिर में स्थित। मूर्ति के बालों में से एक बाल सफेद दिखाई दिया।
जिसके पश्चात महाराणा ने उस बाल को चिपका हुआ समझा। जहां वह उस बाल को निकालते है। तो मूर्ति के अंदर से रक्त की बूंदे टपकने लगती है।
कहा जाता है इसके बाद भगवान श्री चारभुजा नाथ जी अपने भक्त देवा की लाज रखी।
जहां उसी दिन की रात को। भगवान श्री कृष्ण। महाराणा के सपनों में पधारे। ओर कहा कोई भी महाराणा मेरे दर्शन करने के लिए गढ़बोर नहीं पधारे। तब से यह स्पष्ट हो चुका था। जहां आज भी मेवाड़ के कोई भी महाराणा Charbhuja Ji Mandir के दर्शन करने के लिए नहीं आते है।
यद्यपि महाराणा बनने से पूर्व। युवराज के रूप में। मंदिर पधारकर पूजा अर्चना करते हैं। जिसके बाद वह महाराणा की पद्धति स्वीकार करते है।
8 संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी और अन्य विशेषताएं

गढ़बोर के Charbhuja Ji Mandir का प्रतिवर्ष। भाद्र प्रमास शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात् जलजुलनीय एकादशी को विशाल मेला लगता है।
वही जलजुलनीय एकादशी के अतिरिक्त भी। गढ़बोर के Charbhuja Ji Mandir में। होली, नवरात्रि, रामनवमी ओर दीपावली के दिन आदि दिवशों पर भी यहां विशेष उत्सव मनाया जाता हैं।
इसी बीच दर्शनार्थियों तथा श्रद्धालुओं का अच्छा खासा हुजूम उमड़ता है। वही गढ़बोर के चारभुजा नाथ मंदिर के अलावा इसके पास कुछ ओर भी ऐतिहासिक ओर धार्मिक स्थल निम्नलिखित है।
जिनमें कुंभलगढ़ का किला, रोकड़ियां हनुमान जी का मंदिर, लक्ष्मण झूला, श्री राम मंदिर, श्री रूपनारायण जी, परशुराम महादेव का मंदिर, रणकपुर जैन मंदिर श्री द्वारकाधीश मंदिर और श्री नाथ जी नाथद्वारा आदि को भी देखे जा सकते है।
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